अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

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पी एम ने यह क्‍या कह दिया

Posted On: 14 Jun, 2013 मस्ती मालगाड़ी में

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खेल और राजनीति के अलग रहने की बात माननीय पीएम ऐसे कह रहे हैं, मानो राजनीति और खेल डबल बैडरूम में इकट्ठी रहती हैं। जहां दोनों के बीच लंगोटिया दोस्‍ती परवान चढ़ चुकी है। उन्‍हें अलग रहने के लिए कहना जितना आसान है,उतना करना नहीं क्‍योंकि इनका बरसों पुराना याराना है, पल दो पल में टूटने से तो रहा। आज जबकि मुल्क की विकास दर अपने न्यूनतम पर है और देश के दार्शनिक अल्पभाषी मुखिया का ऐसे में महत्वपूर्ण बयान आया है कि खेल और राजनीति को अलग-अलग रखें। ऐसा बयान कोई पहुंचा हुआ संत ही दे सकता है। एक बार एक अस्वस्थ साधु से उनके शिष्यों ने पूछा –महाराज आप कैसे हैं तो उनका जवाब था – मैं तो ठीक हूँ, बस शरीर बीमार है। उनकी इस बात पर सब चकित रह गए थे। यह बात पुराने ज़माने की है। इस ज़माने में कोई किसी बात पर नहीं चौंकता, केवल गहरी सोच के दलदल में इस सोच के साथ कूद पड़ता है कि इस विचाररूपी कीचड़ में से कोई न कोई फूल देर या सवेर जरूर खिलेगा।

जाहिर है पीएम खुद तो एक शातिर खिलाड़ी की तरह राजनीति के मैदान में दौड़ रहे हैं और खिलाडि़यों के लिए राजनीति में दौड़ने के बरखिलाफ हैं। राजनीति और खेल में सांप नेवले वाला बैर नहीं है, उस पर यह बयान निश्‍चय ही चौंकाता है कि राजनीति और खेल का घालमेल घातक है। सब जानते हैं कि राजनीति के घोटाले और खेल की स्‍पॉट फिक्सिंग के जरिए मौकेबाज जमकर सोना बटोरने में लगे हैं। खेल और क्रिकेट भी राजनीति और घोटाले की तरह पर्यायवाची बन चुके हैं। माहिर खिलाड़ी राजनीति में स्‍पॉट फिक्सिंग जैसे खेल और कुशल राजनीतिज्ञ खेल में चमत्‍कारी राजनीति कर जाते हैं।

ऐसी सभी कवायदें जीवन और धन से जुड़ी हुई हैं जिनमें जीवन गौण हो चुका है और धन ने तेजी से बढ़त हासिल की है। मूल मुद्दा धन हथियाने का है। खिलाड़ी राजनीति में और राजनीतिज्ञ खेल से जुड़े संस्‍थानों में घुसने के लिए सदैव लालायित रहते हैं, ताजा मिसाल सिद्धू पाजी दी हैगी ए। दीवानगी का आलम यह है कि हंसोड़ तक राजनीति में घुसकर प्रेसीडेंट और पीएम की कुर्सी हड़पने के जोड़ तोड़ में जुट गए हैं। कोई शक नहीं कि पप्‍पुओं से घिरे राजू को मुगालता हो गया है कि जो पब्लिक अब तक उनके लतीफों पर हंसती और वाह वाह करती है, वही उनके लिए सत्‍ता में आने का रास्‍ता खोल देगी जहां पर वे खूब इस्‍तीफा इस्‍तीफा खेलने का मजा ले सकेंगे और खूब बयानबाजी करके अपना भरा हुआ पेट खाली कर लेंगे। जिन कीर्तिमानों के लिए राजनीति में घाघों को भी बेशर्म होकर खूब डटकर श्रम करना होता है, वे भी चुनाव के मैदान में बुरी तरह पटकनी खा कमर तुड़वा बैठते हैं और कमर लचकने की वजह से ढंग से बैठने से भी महरूम हो जाते हैं।

अब समय आ गया है कि राजनीति और खेल में गरिमामय दूरी बनी रहे और अत्यंत रहस्यमय  हिस्‍सेदारी भी। दोनों सार्वजनिक रूप से दूर रहें और मन ही मन में एक शरीर एक परमात्मा। देश के मुखिया का भी यही मंतव्य है। देश की विकास दर घटती है तो उसे घटने दें,इस मामले में कोई राजनीति न करें। घटी विकास दर को पूरी खेल भावना से अंगीकार करें। कोई इस पर फि़ज़ूल सवालबाजी न करे। बीमार शरीर से अपने मन को अलग कर लें, सब चाक-चौबंद हो जायेगा। विकास दर का क्या, आज घटी है तो कल  खेल की दुनिया का कोई विशेषज्ञ उसे मनचाही ऊंचाई पर ले जा कर फिक्स कर देगा। यह सबको पता है कि राजनीति और खेल के अंतर्संबंध पूरी तरह मजबूत जोड़ से जुड़े हैं। इनके बीच चोली और दामन का पुरातन गठजोड़  है जो तोड़ने से भी नहीं टूटने वाला। लेकिन इसके दिखावे से बचने की जरूरत है। यही तो  पीएम कह रहे हैं इस पर  उनकी तारीफ करना तो बनता ही  है। कैप्टेन कूल यही बात सही समय आने पर कहेंगे।

जब तय होना चाहिए कि कठपुतली रूपी इस तथाकथित खेल में राजनीति और खेल की कितने प्रतिशत की हिस्‍सेदारी रहे उस समय यह सवाल उठाना निहायत ही बेईमानी है। दूध और पानी के एक बार आपस में मिलने के बाद उन्‍हें अलग करने की कोशिश हास्‍यास्‍पद है। वैसे यह लतीफा है बहुत ही मौजूं और काफी दिनों तक राजनीति और खेलों में गेंद के माफिक उछलकर सबका मनोरंजन करता रहेगा।  धोनी पीएम की तरह नकल मारकर चुप्पी साधे बैठे हैं और पीएम गुजारिश कर रहे हैं कि इशारों को अगर समझो स्‍पॉट फिक्सिंग को खेल से जुड़ा रहने दो जबकि कौन नहीं जानता कि आज राजनीति का स्‍पॉट कम, पूरा का पूरा लॉट ही फिक्‍स हो चुका है। फिर भी पीएम की इस स्‍वीकारोक्ति पर उनकी तारीफ करना बनता है कि जहां जरूरी होता है, वे मैडम की सलाह लेते हैं,लेकिन इस बात पर हम चुप ही रहेंगे कि कहां जरूरत है, यह बात उन्‍हें मैडम ही बतलाती हैं। राजनीति में स्‍पॉट फिक्सिंग का इससे जीवंत उदाहरण और क्‍या होगा ?



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