अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

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तू भाई है नोट से लिपट

Posted On: 15 Nov, 2012 मस्ती मालगाड़ी में

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भाईयों की असली सेवा लेने का वक्‍त इस भैया दूज से शुरू हो गया है। जगह जगह दुकानें खुल गई हैं। आर्थिक महामंदी के इस दौर में भाईगिरी में सर्वाधिक संभावनाएं देखी जा रही हैं। अखबारों में, इंटरनेट पर, टी वी पर, ब्रेकिंग न्‍यूज में मतलब सब जगह इसी की चर्चा है कि भाईगिरी का धंधा गांधीगिरी से भी उपर चढ़ने वाला है। संजय दत्त को लेकर जो फिल्‍म बनने वाली थी, इस सीक्‍वल की चौथी फिल्‍म का संभावित शीर्षक था : भैया दूज वाला मुन्‍नाभाई और उसकी भाईगिरी या मुन्‍नाभाई भैया दूज वाला। पर फाइनल हुआ भैयादूज वाले मुन्‍नाभाई की भाईगिरी। फिल्‍म के टाइटल सांग के लिए प्रसून जोशी ने हामी भर दी है। पर मुकर भी सकते हैं जबकि जब मिलेंगे नोट तो मुकर नहीं पाएंगे और गाएंगे :  तू भाई है नोट से लिपट।  संगीतकार ए आर रहमान।

पटकथा के लिए विख्‍यात पटकथा लेखक कतार बांधे खड़े हैं और सबसे अचरज की बात है, आपको यकीन भी नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए कि इस कड़ी से मुख्‍य कलाकार रिप्‍लेस कर दिया गया है क्‍योंकि निर्माताओं को लगता है कि इस फिल्‍म के निर्माण की खबर मिलते ही सरकार संजू भाई को फिर सींखचों में डाल देगी। इसलिए संजय दत्त की जगह अमिताभ बच्‍चन को साइन किया गया है। सर्किट की भूमिका के लिए संजय दत्त की सेवाएं लेने पर विचार किया जा रहा है क्‍योंकि वे अनुभवी हैं। पर उनके जेल जाने से पहले सब सीन फिल्‍माकर निपटा लिए जाएंगे।  सर्किट के साथ काम करते करते उन्‍हें अच्‍छा खासा अनुभव हो गया है। वो तो भाई की भूमिका के लिए अरशद वारसी को लेने का प्रपोजल भी था पर मंदी और भी गंदी हो जाती।

गंदगी से बचाने का बीड़ा बिग बी का सौंपा गया है। अब छियासठ साला कलाकार को भाईगिरी का जामा क्‍यों पहनाया जा रहा है, इसका मूल कारण मंदी है। जिससे बाहर निकलने के लिए महंगाई की लंबाई वाला अभिनेता ही चाहिए, बनता है। मंदी में फैलने वाली गंदगी शेयर बाजार की देन है जो सारे विश्‍व में मंदी का कचरा फैला रही है। इक्विटी को ई कूड़े में तब्‍दील कर दिया गया है और इसे निवेशकों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए काफी खतरनाक बतलाया जा रहा है। इसके दुष्‍प्रभाव ही हैं कि निवेशक, दलाल इत्‍यादि खुदकुशी कर रहे हैं। ऐसी भी सूचनाएं मिली हैं कि खुदकुशी के तरीके बतलाने वाले साहित्‍य की भारी मांग है। इंटरनेट पर भी ऐसी ही साइटें खंगाली जा रही हैं। मंदी से उपजी खुदकुशी कला में एक भयानक तेजी के संकट का खतरा मंडरा रहा है। पर  यह आर्ट अपनी खुशी से अंजाम तक पहुंचती है।

जिस प्रकार निवेशक शेयर बाजार में धन लगाकर, फल न मिलने पर, जड़ें खोदने में मशगूल हो जाता है और सरकार को कोई एतराज नहीं होता। वैसे वो जाहिर में बयानबाजी करती रहती है। वित्त मंत्री और जरूरत होती है तो प्रधानमंत्री भी इसमें शामिल हो जाते हैं। आखिर वोटधन से जुड़ा मसला है। जनहित को देखते हुए अगर कल राष्‍ट्रपति भी बयान देने में जुट जाएं तो आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए जबकि राष्‍ट्रपति को वोटों की दरकार नहीं रहती है। बिना वोटों की दरकार के वे सरकार में रहते हैं। चुनाव के सामान्‍य नियम वहां लागू नहीं होते हैं। जिस प्रकार शेयर बाजार के गिरने के कोई नियम नहीं हैं।

मुंबई में राज ठाकरे के काज से प्रेरित होकर पटकथा लेखन में कई भाई लोग ही व्‍यस्‍त हो गए हैं। इसलिए वहां पर तोड़ फोड़ में पिछले कुछ दिन से मंदी पसर गई है। जिसे संजय निरूपम ने अपने हालिया ब्‍यान से वापिस विकास की ओर ले जाने की क��शिश की है। उन्‍होंने तीनों ठाकरों (ठाकुरों नहीं) को बिना सुरक्षा के लिए मुंबई में घूमने की ही चेतावनी दे डाली है। जिससे ढीली हो रही सुरक्षा की डाली है, वैसे सुरक्षा की डाली न पेड़ कभी मजबूत रहे ही नहीं रहे हैं। सुरक्षा रूपी पेड़ की जड़ों को मजबूती प्रदान करने का वक्‍त आ गया है। देशहित के लिए यह जरूरी लगने लगा है। पैसा पचाने की तरकीब बतलाने वाले इस क्षेत्र में आई मंदी के बरक्‍स भाई लोग भैया दूज के पावन अवसर पर पैसा निकलवाने के जुगाड़ भिड़ाने पर आजकल भारी छूट दे रहे हैं। दीपावली के बाद भी सेल का सा माहौल है। धंधा तो आखिर धंधा है। मंदा होने पर यही चंगा लगता है।  ‘चूके न चौहान’  की नीति ही फायदेमंद रहती है, फायदेबंद से तो फायदेमंद रहना ही अच्‍छा। धीरे धीरे ही सही, फायदा जारी रहना चाहिए। बिल्‍कुल बंद होने पर फाकामस्‍ती जो खिलने लगेगी, इसको खिलखिलाने भी तो नहीं देना है।

एक पुराना किस्‍सा है। एक सांसद हुए हैं बाबू भाई, उनके नाम के आगे भाई पहले से ही जुड़ा हुआ था तो नाम की लाज तो रखनी थी इसलिए दूसरों की बीबियों को विदेश पहुंचाने का पावन धंधा करने लगे, पकड़े गए थे। न पकड़े जाते तो पराई बीबियों को अपनी बनाकर दूसरे देश में छोड़ने से अब तक करोड़ों कमा चुके होते। उस धंधे में शेयर बाजार की तरह कभी मंदी आने की संभावना भी नहीं थी क्‍योंकि अपनी बीबी से पिंड छुड़ाने और दूसरी से भिड़ाने के लिए तो शौहर सब कुछ लुटाने/गंवाने के लिए सदा मुस्‍तैद रहता है। दूसरे की बीबी सुंदर जो नजर आती है। इसकी तस्‍दीक करते हुए नवभारत टाइम्‍स के दीपावली 2008 के वार्षिकांक में आईनाबाज ने एक किस्‍सा प्रस्‍तुत किया है, आप भी गौर फरमाएं :- बाबूलाल सड़क से अपनी पत्‍नी के साथ चलते वक्‍त बार-बार रास्‍ते से गुजर रही राखी सावंत की ओर देख रहे थे। इस तरह की हरकत बार-बार करने वाले बाबूलाल को डांटते हुए उनकी पत्‍नी ने कहा, ‘शर्म नहीं आती, शादीशुदा होने के बावजूद पराई औरतों पर नजर रखते हो।’  बाबूलाल जी ने किसी संत की तरह प्रतिक्रिया दी – ‘डार्लिंग, पेट भरा है, इसका मतलब यह तो नहीं होता कि आदमी मेनू कार्ड ही न देखे।’

पर अपने बाबू भाई पकड़े गए, नहीं तो न जाने कितनी मिसालें पैदा होतीं। कितना धन अब तक देश में आ चुका होता, यह भी हो सकता है कि जो दौर भारत में मंदी का छाया है, वो इसके चलते अपने पैर न फैला पाता। पर कहा गया है न कि ‘वक्‍त से पहले और भाग्‍य से अधिक’ किसी को कुछ नहीं मिलता, तो बाबू भाई और देश के भाग्‍य में जो लिखा था, वही मिला और जो लिखा था निवेशकों के भाग्‍य में वो उन्‍हें मिल रहा है।

अपने एक पंजाबी पुत्‍तर दलेर हुए हैं। वे बीबियों के शौहरों को निर्यात करने का धंधा करते थे, जिसे कबूतरबाजी के नाम से जाना गया। उनके नाम के आगे मेंहदी लगी थी जिससे महिलाएं उनसे आकर्षित होकर संपर्क करती थीं, पर देश का दुर्भाग्‍य वे भी पकड़े गए और एक और मंदी विरोधी धंधे पर लगाम लग गई। जबकि वे सदा कहते रहे कि मेरे नाल रहवोगे तो ऐश करोगे, मेरे नाल, ओ, ओ, मेरे नाल। पर उसकी ऐश बांटने वाली दवा पर भी सरकार की खुराफाती नजर पड़ गई। सब जगह बेअसर रहने वाली सरकार वहां असरदार हो गई। उसकी अपनी इन्‍हीं करतूतों की वजह से देश मंदी की चपेट में तड़प रहा है और कोई दवा कारगर नहीं हो रही है। अगर इस भैया दूज पर भैयादूज वाले मुन्‍नाभाई की भाईगिरी को, वैधता प्रदान कर दी जाए, जैसे दिल्‍ली सरकार अवैध कालोनियों को वैधता प्रदान करती जा रही है, तो फिर देश को आर्थिक महामंदी के इस महासागर से उबरने से कोई ताकत नहीं रोक सकती। भाईगिरी के दायरे में कबूतरबाजी, कौआबाजी, कोयलबाजी, तोताबाजी, मैनाबाजी, गिरगिटबाजी इत्‍यादि कलाओं को भी लिया जाना देश और जनह���त में रहेगा।

लिखते-लिखते खबर मिली है कि ब्रेकिंग न्‍यूज के लिए धांधली मचाने वाले एक चैनल पर ‘भूत स्‍टॉक एक्‍सचेंज’ से जुड़ी एक स्ट्रिप प्रसारित हो रही है। जिसमें सुर्खियां दिखलाई जा रही हैं कि आज एक भूत दिखलाया जाएगा। भूत बतलाएगा कि वो कैसे उकसाता है आत्‍महत्‍या करने के लिए। वो भूत जो शेयर बाजार का एक शातिर खिलाड़ी था पर मंदी होने पर अनाड़ी सिद्ध हुआ। अब मरने के लिए उकसा रहा है। वो यह राज भी खोलेगा कल कि जिस भूतनी से वो शेयर टिप लेता था। वो उसको भैया दूज पर तिलक करती थी। इन सब दुर्घटनाओं के वीडियो क्लिप एक खोजी भूत ने उपलब्‍ध करवाए हैं जिनका प्रसारण रात दो बजे किया जाएगा। तो भैया दूज की इस अभूतपूर्व अवसर पर इतना ही। बाकी मजा ब्रेकिंग न्‍यूज में लेना मत भूलें। बहरहाल, एक ताजा शोध सुर्खियों में है कि सरकारी कर्मचारी आत्‍महत्‍या नहीं करते हैं। अब समझ में आ रहा है कि सब सरकारी नौकरियों की ओर ही क्‍यों, बेतहाशा दौड़ लगाते हैं। इसी दौड़ के कारण ही भ्रष्‍टाचार की होड़ शुरू हो जाती है। आपने तो नहीं दौड़ना शुरू कर दिया न ?



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prabhakar / ITB के द्वारा
December 2, 2012

प्रिय ब्लॉगर मित्र, हमें आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है साथ ही संकोच भी – विशेषकर उन ब्लॉगर्स को यह बताने में जिनके ब्लॉग इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें किसी भी सूची में सम्मिलित करने से उस सूची का सम्मान बढ़ता है न कि उस ब्लॉग का – कि ITB की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगों की डाइरैक्टरी अब प्रकाशित हो चुकी है और आपका ब्लॉग उसमें सम्मिलित है। शुभकामनाओं सहित, ITB टीम पुनश्च: 1. हम कुछेक लोकप्रिय ब्लॉग्स को डाइरैक्टरी में शामिल नहीं कर पाए क्योंकि उनके कंटैंट तथा/या डिज़ाइन फूहड़ / निम्न-स्तरीय / खिजाने वाले हैं। दो-एक ब्लॉगर्स ने अपने एक ब्लॉग की सामग्री दूसरे ब्लॉग्स में डुप्लिकेट करने में डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर रखी है। कुछ ब्लॉगर्स अपने मुँह मिया मिट्ठू बनते रहते हैं, लेकिन इस संकलन में हमने उनके ब्लॉग्स ले रखे हैं बशर्ते उनमें स्तरीय कंटैंट हो। डाइरैक्टरी में शामिल किए / नहीं किए गए ब्लॉग्स के बारे में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा। 2. ITB के लोग ब्लॉग्स पर बहुत कम कमेंट कर पाते हैं और कमेंट तभी करते हैं जब विषय-वस्तु के प्रसंग में कुछ कहना होता है। यह कमेंट हमने यहाँ इसलिए किया क्योंकि हमें आपका ईमेल ब्लॉग में नहीं मिला। [यह भी हो सकता है कि हम ठीक से ईमेल ढूंढ नहीं पाए।] बिना प्रसंग के इस कमेंट के लिए क्षमा कीजिएगा।

Santlal Karun के द्वारा
November 18, 2012

अत्यंत दिलचस्प हास्यमिश्रित व्यंग्य आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ” अब छियासठ साला कलाकार को भाईगिरी का जामा क्‍यों पहनाया जा रहा है, इसका मूल कारण मंदी है। जिससे बाहर निकलने के लिए महंगाई की लंबाई वाला अभिनेता ही चाहिए, बनता है। मंदी में फैलने वाली गंदगी शेयर बाजार की देन है जो सारे विश्‍व में मंदी का कचरा फैला रही है। “


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