अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

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‘सॉरी’ हिंदी दिवस पर अंग्रेजी बोली

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हिंदी का सौभाग्‍य माने या दुर्भाग्‍य कि सितम्‍बर माह में प्रत्‍येक बरस हिंदी बतौर सेलीब्रेटी पहचानी जाती है। इस महीने में सिर्फ हिंदी की जय जयकार ही होती है। जो अंग्रेजी में ‘लोंग लिव हिंदी’ के नारे लगाते हैं, वे फिर ‘सॉरी’ कहकर अपनी गलती भी मान लेते हैं। हिंदी का जन्‍मदिन हिंदी दिवस है, ऐसा सोचने वाले अपने मुगालते को दुरुस्‍त कर लें क्‍योंकि यह वह दिन है जिस दिन हिंदी को राष्‍ट्रभाषा का दर्जा देकर तुरंत दराज में बंद कर दिया गया और दराज क्‍योंकि मेज में होती है इसलिए वह आफिस में कैद होकर रह गई। हिंदी आज तक उस कैद से छूट नहीं सकी है। सिर्फ इसलिए कि जिससे उसका दिल ऑफिस में लगा रहे, उसके नाम पूरा माह आंबटित कर दिया गया है। हिंदी प्रेमी इस हरकत से भड़क न उठें इसलिए उनसे इस माह में खूब भाषण, वक्‍तव्‍य, चर्चाएं करवा ली जाती हैं और उसके बदले में उन्‍हें पांच सौ या एक हजार रुपये देकर बहला दिया जाता है। इसके अतिरिक्‍त कार्यालय में अंग्रेजी में काम करने वालों से हिंदी में निबंध, टिप्‍पणी, शब्‍द अर्थ और टाइपिंग जैसे कार्य करवा कर प्रति‍योगिता करवा दी जाती है और उनकी जेबों में पारितोषिक के नाम पर कुछ करेंसी नोट का चढ़ावा चढ़ा दिया जाता है।

हिंदी वाले इतने भोले हैं कि वे ऐसे भालों की चुभन को हंस हंसकर सह लेते हैं।  हिंदी वालों के लिए ही, अंग्रेजी वालों के साथ घु‍ल मिलकर सितम्‍बर माह को बतौर उत्‍सव सेलीब्रेट किया जाता है।  जिसे मनाने के लिए हम ग्‍यारह महीने पहले से इंतजार करते है और फिर 15 दिन पहले से ही नोटों की बिंदिया गिनने के लिए सक्रिय हो उठते हैं। अध्‍यक्ष और जूरी मेंबर बनकर नोट बटोरते हैं और उस समय अंग्रेजी बोल-बोल कर सब हिंदी को चिढ़ाते हैं। हिंदी की कामयाबी के गीत अंग्रेजी में गाते हैं। कोई टोकता है तो ‘सॉरी’ कहकर खेद जताते हैं। सरकारी कार्यालयों में हिंदी को बहलाने के लिए सितम्‍बर माह में काम करने पर पुरस्‍कारों का अंबार लग जाता है। जिसे अनुपयोगी टिप्‍पणियां, शब्‍दों के अर्थ-अनर्थ लिखकर, निबंध, कविताएं लिख-सुना कर लूटा जाता है। लूट में हिस्‍सा हड़पने के लिए सबकी आपस में मिलीभगत क्रिया सक्रिय हो उठती है। हिंदी को कूटने-पीटने और चिढ़ाने का यह सिलसिला जितना तेज होगा, उतना हिंदी की चर्चा और विकास होगा।

हिंदी के नाम पर सरकारी नौकरी में चांदी ही नहीं, विदेश यात्राओं का सोना भी बहुतायत में उपलब्‍ध रहता है। इसके लिए ‘विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन’ किए जाते हैं और खाते-पीते खुशी मनाते जेबें भरी जाती हैं। परिवार के साथ विदेश यात्राओं का सपरिवार लुत्‍फ लूटा-खसूटा जाता है। एक कड़वी सच्‍चाई यह भी है कि सिर्फ हिंदी में लेखन से रोजी रोटी कमाने वालों का एक जून की रोटी का जुगाड़ भी नहीं जुटता।  खीर खाने को मिलती है तो वह उस तक आते-पहुंचते ‘टेढ़ी खीर’ हो जाती है। पुस्‍तक प्रकाशक और अखबार, पत्रिकाएं छापने वाले हिंदी लेखकों को जी भर कर लूटे जा रहे हैं। प्रकाशक लेखक से ही सहयोग के नाम पर दाम वसूलकर पुस्‍तकें छाप कर बेचते हैं, जिसके बदले में छपी हुई किताबें एमआरपी मूल्‍य पर भेड़ देते हैं। गजब का सम्‍मोहन है कि लेखक इसमें मेहनत की कमाई का निवेश कर गर्वित होता है। किताबें अपने मित्र-लेखकों, नाते-रिश्‍तेदारों को फ्री में बांट-बांट कर उल्‍लसित होता है कि अब उसका नाम बेस्‍ट लेखकों में गिन लिया जाएगा। यही वह परम आनंद की स्थिति होती है जब उसे अपने उपर गर्व हो आता है।

छपास रोग इतना विकट होता है कि लेखक मुगालते में जीता है कि जैसा उसने लिखा है, वैसा कोई सोच भी नहीं सकता, लिखना तो दूर की बात है। बहुत सारे अखबार, पत्रिकाएं, लेखक को क्‍या मालूम चलेगा, की तर्ज पर ब्‍लॉगों और अखबारों में से उनकी छपी हुई रचनाएं फिर से छाप लेती हैं। इसका लेखक को मालूम चल भी जाता है किंतु वह असहाय-सा न तो अखबार –मैगज़ीन वाले से लड़ पाता हे और न ही अपनी बात पर अड़ पाता है। लेखक कुछ कहेगा तो संपादक पान की लाल पीक से रंगे हुए दांत निपोर कर कहेगा कि ‘आपका नाम तो छाप दिया है रचना के साथ, अब क्‍या आपका नाम करेंसी नोटों पर भी छापूं ।‘ उस पर लेखक यह कहकर कि ‘मेरा आशय यह नहीं है, मैं पैसे के लिए नहीं लिखता हूं।‘ ‘जब नाम के लिए लिखते हैं तब आपका नाम छाप तो दिया है रचना के साथ।‘ फिर क्‍यों आपे से बाहर हुए जा रहे हैं और सचमुच संपादक की बात सुनकर लेखक फिर आपे के भीतर मुंह छिपाकर लिखना शुरू कर देता है।

सरकारी योजनाओं और बजट में धन का प्रावधान हिंदी को जीवन देता रहेगा। सितंबर माह में खीर-पूरी का कॉम्‍बीनेशन बना रहेगा। बकाया 11 महीने मेज की दराज उसके लिए ‘तिहाड़’ बनी रहेगी। जिससे वह सुरक्षित रहेगी और कोई अंग्रेजी-तत्‍व  हिंदी की बिंदी की चिंदी करने में भी कामयाब नहीं हो सकेगा। इस पूरे प्रकरण से साफ है कि हिंदी के चौतरफा विकास को कभी किसी की बुरी नजर नहीं लगेगी, फायदा यह होगा कि जो काली शातिर आंखों वाले इसे निहार रहे होंगे उनका मुंह काला होने से बचा रहेगा। कोयला घोटाले में चाहे मंत्रियों का मुंह, क्‍या समूचा शरीर काला होता रहे किंतु हिंदी पर नजर गड़ाने पर मुंह काला नहीं होना चाहिए, इतनी सतर्कता तो बरती ही जा रही है। जाहिर है कि युगों-युगों तक हिंदी सेलीब्रेटी बनी खुश होती रहेगी, हिंदी वालों को लगेगा कि उनकी पॉकेट भर रही है, सो भरती रहेगी और वे खुश रहेंगे?



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yogi sarswat के द्वारा
September 17, 2012

छपास रोग इतना विकट होता है कि लेखक मुगालते में जीता है कि जैसा उसने लिखा है, वैसा कोई सोच भी नहीं सकता, लिखना तो दूर की बात है। बहुत सारे अखबार, पत्रिकाएं, लेखक को क्‍या मालूम चलेगा, की तर्ज पर ब्‍लॉगों और अखबारों में से उनकी छपी हुई रचनाएं फिर से छाप लेती हैं। इसका लेखक को मालूम चल भी जाता है किंतु वह असहाय-सा न तो अखबार –मैगज़ीन वाले से लड़ पाता हे और न ही अपनी बात पर अड़ पाता है। लेखक कुछ कहेगा तो संपादक पान की लाल पीक से रंगे हुए दांत निपोर कर कहेगा कि ‘आपका नाम तो छाप दिया है रचना के साथ, अब क्‍या आपका नाम करेंसी नोटों पर भी छापूं ।‘ उस पर लेखक यह कहकर कि ‘मेरा आशय यह नहीं है, मैं पैसे के लिए नहीं लिखता हूं।‘ ‘जब नाम के लिए लिखते हैं तब आपका नाम छाप तो दिया है रचना के साथ।‘ फिर क्‍यों आपे से बाहर हुए जा रहे हैं और सचमुच संपादक की बात सुनकर लेखक फिर आपे के भीतर मुंह छिपाकर लिखना शुरू कर देता है। श्री वाचस्पति जी , नमस्कार ! बड़ी बात कही आपने !


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