अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

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बेटा होने से पहले मर जाऊं

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हमारी फिल्‍मों ने बाप नामक जीव का इत्‍ता नुकसान किया है कि बेटे बाप की फिल्‍मी मरम्‍मत करते रहे हैं। फिल्‍में समाज का दर्पण है, फिल्‍मों में जो घट रहा था, वह अब सचमुच में प्‍लस होने वाला है। बाप सावधान हो जाएं, सिर्फ बाप ही नहीं पिताश्री, डैडी, पिताजी, डैड, बापू, अप्‍पा, अब्‍बा  जैसे अन्‍य संबोधनधारक भी स्‍वयं को सेफ न समझें।  बेटे के कारनामों का डायरेक्‍ट इफेक्‍ट जल्‍दी ही बाप के गाल पर दिखाई दिया करेगा।

मसला अभी पूरी तरह मसला नहीं गया है लेकिन ‘बेटा करे करतूत और बाप खाए शहतूत’ के रसीले जमाने अब लदने वाले हैं। लदने से आप ओलंपिक खेलों में पदक लाने के लिए लंदन जाने का आशय मत लगा लीजिएगा। जनता कम सुनती है और मंत्रियों की बातों पर अमल नहीं करती। जबकि कही बात से मुकर जाना – मंत्रियों का सुर्खी पाने का मंत्र है। जिसमें मुख्‍य भूमिका वही जीभ यंत्र बनकर निबाहती है, जो दिन भर आपके मुंह में लार में नहाती है। कभी मीठी हो जाती है तो मीठे मंत्र दे जाती है और नमकीन या खट्टे, कसैले से नहाने पर कड़वे बीज मंत्र देती है।

छत्‍तीसी के गढ़ में सेंध लगाने वाले मन-मंत्री रमन के बत्‍तीसी ओपन करने पर बाप घबरा गए हैं और बेटे अपराध करने के मूड में आ गए हैं। मानो, अपने सगे बाप से पुरानी दुश्‍मनी का बदला ले रहे हों। यह भी माना जा सकता है कि मंत्री खुद कोई करतूत करने वाले हों और ……….. ।  खैर, मामला बहुत भयानक होने वाला है, कल कोई ‘दीदी’, बनकर ‘दादा’ एक बीज मंत्र जमाने को दे सकती है कि ‘गलती करे बेटी तो पिटे माता’। राजनीति के स्‍पेशल इफेक्‍ट के आईने में भविष्‍य की कल्‍पना करता हूं तो सिहर जाता हूं कि ‘बेटे-बेटियों’ की करतूतें क्‍या गुल खिलाने वाली हैं, इश्‍क करते पकड़े जाएंगे ‘बेटे-बेटियां’ और भुगतेंगे ‘मम्‍मा-बापू’।

तकनीक सदा जमाने को फायदा ही पहुंचाती है, इसे समझ लेंगे तो जरूर जान जाएंगे कि मंत्री क्‍यों रोने-रुलाने वाले बयान देते हैं। इस बयान की कोई कितनी भी थुक्‍का-फजीहत और घनघोर निंदा कर रहा है जबकि अपने देश का जनसंख्‍या विभाग बहुत खुश है। ‘अब्‍बा-अम्‍मा’ की इस संभावित पिटाई के कारण जनसंख्‍या विभाग अपनी नीतियों के प्रचार-प्रसार  पर किए जा रहे बजट को सरेंडर करते हुए वित्‍त विभाग को कह सकता है कि जनसंख्‍या रोकने की मद में बजट रुपी करवट अपनी ओर करने की न तो जरूरत है और न ही बेहिसाब धन बर्बाद करने की।

पड़ोस के बेटे-बेटियों के मोहब्‍बत संबंधी मामलों का खामियाजा, जब ‘माता-पिता’ पिटकर करेंगे तब इस सद्गति को देखकर भला कौन बेटे-बेटियों की चाह करेगा, इससे तो बे-औलाद मरना पसंद करेगा। मर जाएगा लेकिन उस जुर्म के लिए पिटने से जरूर बचना चाहेगा, जो उसने किया ही नहीं है। फिल्‍मों में पिट-पिट कर कोई मर रहा हो तो ‘लाईक’ किया जाता है जबकि सचमुच में पिटने से हर कोई खौफ खाता है। मतलब बाप बनना हो रहा है अभिशाप जैसा श्राप को देने की जरूरत नहीं है। सब ‘बाप’ बनकर रोमांचित होते रहे हैं लेकिन अब बचकर उनकी खुशी का कोई पारावार नहीं रहेगा। एक बेटा हो जाए तो तर जाऊं, की चाह रखने वाले कहेंगे कि बेटा होने से पहले मर जाऊं।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
August 1, 2012

अविनाश जी आपका लेख बहुत ही सटीक व्यंग है.माता-पिता को अपने संतान के प्रति बहुत सजाग रहने की ज़रूरत है.असल में जब समाज का अवमूल्यन बहुत अधिक हो जाए तो जड़ की जांच पड़ताल ज़रूरी हो जाती है.यह भी उसी क्रम का हिस्सा है.

rekhafbd के द्वारा
August 1, 2012

अविनाश जी ,बढ़िया व्यंगात्मक आलेख ,बधाई


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