अविनाश वाचस्‍पति

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मौत को अब तू मनाना सीख ले (कविता)

Posted On: 22 Jul, 2012 मस्ती मालगाड़ी में

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मौत को अब तू मनाना सीख ले

बुलाए मौत तुरंत जाना सीख ले

मैं तैयार हूंआ मौत,

कर मेरा सामना

मैं नहीं करूंगा तुझे मना

डर कर नहीं लूंगा नाम तेरा

जानता हूं, मारना ही है काम तेरा

डराना भी तूने अब सीख लिया है

डरना नहीं है, जान ले, काम मेरा

आए लेने तो करियो मौत

पहले तू सलाम

कबूल करूंगा सलाम तेरा नहीं डरूंगा

भय की भीत पर मैं नहीं चढूंगा

कर लिया है तय

डर कर मैं एक बार भी नहीं मरूंगा

मारना चाहेगी तू मुझे

मैं तब भी नहीं डरूंगा

मरूंगा, तैयार हूं मरने को

लेकिन जी हुजूरी

कभी नहीं करूंगा

न मौत की

न बीमारी की

न सुखों को काटने वाली आरी की

दुखों से करूंगा प्‍यार मैं, यारी करूंगा

लेकिन उधार लेकर नहीं मरूंगा

नियम यह मैंने तय किए हैं

तुझे न हों पसंद

नहीं पड़ता अंतर

जीवंतता से जीने का

यही है मेरा कारगर मंतर।

व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल का आवरण



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
July 24, 2012

अविनाश जी, जीवन्तता से जीने का आपका कारगर मंतर बहुत सही है अच्छी कविता http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/07/23/bhaarat-bheedbhaav-ka-samarthak/

yogi sarswat के द्वारा
July 24, 2012

लेकिन उधार लेकर नहीं मरूंगा नियम यह मैंने तय किए हैं तुझे न हों पसंद नहीं पड़ता अंतर जीवंतता से जीने का यही है मेरा कारगर मंतर। बहुत खूब , सुन्दर अभिव्यक्ति !


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