अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

107 Posts

253 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1004 postid : 227

किसानों को आत्‍महत्‍योपरांत सम्‍मानित किया जाए

  • SocialTwist Tell-a-Friend

किसान परेशान होकर आत्‍महत्‍या कर रहा है। नेता बेईमान काले धन से लिपट रहा है। मेरा देश महान फिर भी महान है। किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं, यह उनका दोष है। खेती करो, फिर खेती में नुकसान हो तो किसने कहा है कि आत्‍महत्‍या करो। जैसे खेती आपने किसी से पूछ कर नहीं की, वैसे ही आपको किसी ने आत्‍महत्‍या करने के लिए भी तो अनुरोध नहीं किया है। धंधा कोई भी हो उसमें नफा नुकसान तो चलता रहता है। किसानों के आत्‍महत्‍या करने से तो इस धारणा को बल मिलता है कि खेती करना इस देश में सबसे नुकसानदेह धंधा है बल्कि इसे धंधा मानकर तो किया ही नहीं जा सकता है। अगर खेती का धंधा नुकसानदेह होता तो भारत जो आज कृषिप्रधान होने से गौरवान्वित महसूस कर रहा है, वो न कर रहा होता। समय परिवर्तनशील है इसलिए कृषि में न सही, परंतु इससे जुड़े दलाली के धंधे में तो चमक आई ही है। वैसे भी संपूर्ण देश में आजकल दलालों का बोलबाला है। कोई भी क्षेत्र इससे बचा नहीं है इसलिए असल धंधेबाज तो आज दलाली में मशगूल रहते हैं और सबकी बत्‍ती गुल करते देते हैं। उनका कुछ इंवेस्‍ट नहीं होता फिर भी मोटी मलाई और चिकनाई उनके हिस्‍से में ही आती है और उनके ओठों पर अपनी ऊंगलियां फिराकर कभी भी जांच सकते हैं। आपकी ऊंगली न फिसल जाए तो कहना। इसमें न तो जोखिम होता है और न आय में ही कमी आती है। आता है सिर्फ धन ही धन। वही धन धन्‍नासेठ बनाता है, फिर चाहे उस धन से धान खरीदो अथवा उसी के बल पर वोट खरीदकर राजनीति में घुस जाओ और नोट ही बिछाओ, नोट ही खाओ और नोट ही लहराओ। यहां नोट से तात्‍पर्य करेंसी नोटों से है। किसी सरकारी बाबू की फाईल पर टिप्‍पणी से नहीं। क्‍योंकि अगर आपने विवेक से काम नहीं लिया और अपना और अपने जानवरों का पेट भरने के जुगाड़ में खेती में सुनहरा भविष्‍य जानकर किस्‍मत आजमाई तो इस बात की पूरी गारंटी है कि इसकी परिणति आत्‍महत्‍या में ही होगी।

वैसे भी समझदार सरकार की समझ में यह नहीं आ पा रहा है कि अगर कोई किसान आत्‍महत्‍या करता है तो इसके लिए सरकार जिम्‍मेदार कैसे हो जाती है। जैसे सड़क पर वाहनों के जलने की घटनाओं के लिए सरकार की जिम्‍मेदारी नहीं बनती है, उसी प्रकार किसानों के आत्‍महत्‍या करने की जिम्‍मेदारी सरकार की तो कतई नहीं हो सकती। किसी को किसी के चांटा मारने की जिम्‍मेदारी भी सरकार नहीं लेती है। इसी प्रकार जूते-चप्‍पलों के मरने-मारने की जिम्‍मेदारी सरकार लेने लगी तो सरकार तो मर ही जाएगी। सरकार तो सोते हुए नागरिकों पर डंडे चलवाकर भी जिम्‍मेदारी लेने से किनारा कर लेती है। फिर इस प्रकार की आत्‍महत्‍याओं से तो सरकार का न सीधा और न टेढ़ा ही संबंध है, इसलिए इसकी जिम्‍मेदारी सरकार पर डालना, सरकार के साथ घोर अत्‍याचार है।

सरकार आखिर सरकार है, कोई अभियुक्‍त या आम नागरिक नहीं है कि जिसे पकड़ा और ठूंस दिया जेल में और उस पर मड़ दिया आरोप। इसे ही कहा जाता है पुलिसिया प्रकोप। यह किसी पर भी किसी भी समय बरस सकता है बेमौसम की बारिश की मानिंद।

अब अगर किसानों को मरने में ही आनंद मिल रहा है तो सरकार उनके आनंद लेने के उपक्रम में आड़े कैसे आ सकती है। अधिक समझदार नागरिक मेट्रो के आगे मरने के लिए कूद जाते हैं, उसके लिए जिम्‍मेदार भी मेट्रो को बतलाते हैं। मेट्रो सरकारी मशीनरी है इसलिए जिम्‍मेदार सरकार हो गई। जबकि प्रबुद्ध समुदाय का यह मानना है कि आत्‍महत्‍या करना बढ़ती आबादी स�� निजात पाना ही है और इससे सरकार के द्रुत विकास में योगदान देना ही साबित होता है। जितनी आबादी कम होगी, देश का उतनी तेजी से विकास होगा, इस सच को मानने से भला किसे इंकार होगा। सरकार तो आत्‍महत्‍या कर चुके किसानों को मरणोपरांत सम्‍मानित करने की योजना भी लागू करने वाली है जिससे इस प्रकार के देश विकास के कार्यों को अन्‍य क्षेत्रों में भी भरपूर प्रोत्‍साहन मिल सके। जब एक किसान आत्‍महत्‍या करता है तो वह अकेला नहीं मरता, अपने पूरे परिवार को साथ लेकर मरता है। इससे उसके देशप्रेम के पारिवारिक जज्‍बे के बारे में मालूम चलता है। आखिर अकेला मरकर वह सरकार का कितना धन बचा पाता, इसलिए अंत समय में शर्मिन्‍दा होने से बचने के लिए वह संपूर्ण योगदान करता है।

सिर्फ मीडिया ही इस प्रकार के कार्यों को सही प्रकार से पेश नहीं कर रहा है जिससे इस प्रकार की गतिविधियों से नकारात्‍मक संदेश समाज में जा रहा है। आप उस समाचार में छिपे शुभ विकास संदेश को ग्रहण कीजिए। किसान शब्‍द का शाब्दिक अर्थ तो आन (प्रतिष्‍ठा) के लिए किस (चुंबन) करना है। किस के प्रयोग से आपके मन में डर्टी पिक्‍चर का ख्‍याल तो नहीं कुलांचे मारने लगा। भला मिट्टी लपेटकर डर्टीत्‍व को प्राप्‍त हुआ किसान मिट्टी के सिवाय किस को किस करने की कोशिश कर सकता है, अब वह किसी आइटम गर्ल को किस करने की तो सोचने से रहा। आखिर वह भूमिपुत्र है। उसका प्रत्‍येक किस धरती मां के लिए है। अगर कोई पुत्र अपनी मां को किस कर रहा है तो इसमें गलत क्‍या है। इससे चाहे उसके मुंह में मिट्टी ही क्‍यों न भर जाए ?

आप अपनी भावनाओं को दूषित होने से बचाइये। किसान के आत्‍महत्‍या के योगदान को स्‍वीकारिए, सराहिये। जिससे सचमुच देश का चहुंमुखी विकास हो रहा है। इसे चाहे आप आज नहीं स्‍वीकार रहे हैं, परंतु कल अवश्‍य स्‍वीकारेंगे और इसमें कोई अड़चन आड़े नहीं आएगी।



Tags:     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nancy4vaye के द्वारा
February 28, 2012

नमस्ते प्रिय! मेरा नाम नैन्सी है, मैं अपनी प्रोफ़ाइल को देखा और अगर आप कर रहे हैं आप के साथ संपर्क में प्राप्त करना चाहते मुझ में भी दिलचस्पी तो कृपया मुझे एक संदेश जितनी जल्दी भेजें। (nancy_0×4@hotmail.com) नमस्ते नैन्सी ***************************** Hello Dear! My name is Nancy, I saw your profile and would like to get in touch with you If you’re interested in me too then please send me a message as quickly as possible. (nancy_0×4@hotmail.com) Greetings Nancy

December 28, 2011

अपने हाथों अपनी जान देने का फैसला कोई ख़ुशी-ख़ुशी नहीं ले सकता..! काश की कोई उनकी मर्मान्तक पीड़ा को समझ सकता..


topic of the week



latest from jagran