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अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

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जादू की छड़ी मिल गई सरकार को

वे गरीबी की सीमा सुंदरी से मिलवा रहे हैं या बत्‍तीसी दिखला रहे हैं। शहरियों पर अपनी बत्‍तीसी चमकाने का मौका भी हाथ से नहीं छोड़ेंगे। यह नहीं कि 36 ही बतला देते तो पता तो लगता कि सरकार और पब्लिक में 36 का आंकड़ा है। पर हाय री किस्‍मत, या नेताओं का घाघपना, बहुत चतुर सुजान हैं वे। नाम चाहे कुछ भी हो पर सब जन सज्‍जनता से ओत प्रोत। मीठी छुरी वाली जबान, बेलगाम रखते हैं। अपना हिस्‍सा कहीं न छूट जाए, इसका पूरा ध्‍यान करते हैं, पूरा बंदोबस्‍त करके चलते हैं।

गांव वालों के तो और भी कम। शुक्र है कि 26 तो बतलाए। अगर वे कह देते कि गांव में तो खर्चा होता ही नहीं है। सुबह दिशा मैदान के लिए चले जाओ। पानी पोखर का इस्‍तेमाल करो। गांवों में पीने का पानी का भी झंझट नहीं है क्‍योंकि शहर वालों की तरह भारत के ग्रामवासी नाजुक नहीं है। सब कंकड़-पत्‍थर हजम कर लेते हैं। पानी के कारण लीवर, गुर्दे, किडनी तो शहर वालों की खराब होती है, किसी को हैपिटाइटिस सी, किसी को पीलिया, किसी को पोलियो – अब बीमारी के नाम आगे गरीबी नाम मत बोलियो।

दिशा मैदान से फारिग होकर आओ तो घर की गाय भैंस के दूध या छाछ से छक कर नाश्‍ता करो। मोटे अनाज की रोटियां तोड़ो, आटा तो खेतों में उगाए गेहूं से बना लेते हैं। सब्जियां चाहे जिस मर्जी खेत से तोड़ लाओ। दो चार बैंगन, पच्‍चीस या पचास भिंडी, तोरियां, घिया, कद्दू वगैरह तोड़ लाए तो क्‍या फर्क पड़ेगा, आखिर कृषिप्रधान देश है भारत। जहां अनाज सड़ता है, चूहे खूब दरियादिली से गोदामों में उत्‍पात मचाते हैं। बाग बगीचों से आम, अमरूद, अनार, पपीता, मौसंबी, नारियल उखाड़ लो। गन्‍ने के खेतों में घुस जाओ तो खूब सारे तोड़ लाओ। उनका अपने मजबूत दांतों से चबा चबाकर रस निकाल कर पी लो। पहनने के नाम पर एक बंडी, धोती पहनकर पूरे गांव में घूम लो। सरपंच या पटवारी के धौरे बैठ कर हुक्‍का गुड़गुड़ा लो। गांव वालों के लिए तो पच्‍चीस भी बहुत ज्‍यादा हैं। वहां पर तो दस रुपये ही बहुत ज्‍यादा थे। फिर भी दरियादिल हैं हम, वैसे सागरदिल कहिए हमें तो। हमने हिसाब जो पेश कर दिया है गांव शहर में गरीबी अमीरी के गैप का। एक झटके में हलाल नहीं, अमीर बना दिया है गरीबों को, अगली बार टैक्‍स न वसूल लिया तो कहना, सब तैयार रहना।

हमारी बत्‍तीसी का जलवा गरीबों को भी खिला रहे हैं अमीरी का हलवा। पूरे दिमाग का दही बना दिया है, दूध से तो महंगा ही है। आखिर जनसेवक हैं, योजना बनाते हैं, आयोग में जमे हैं, सिर्फ योग से ही तो सारे काम नहीं सधते, कहीं तो माइनस भी करना ही पड़ता है, सो बेशर्म होकर भी कर रहे हैं। देश का विकास इससे सस्‍ते में और कौन करेगा, यह तो हमारा ही बूता है, जो गरीबों को पहनाया, अमीरों का जूता है। जुटे रहते हैं, उस पर भी आप कहते हैं कि कुछ करते-धरते नहीं हैं। देखा अमीरों को गरीबों की धरा पर पटक दिया है कितनी जोर से कि सब बिलबिला रहे हैं। इन योजनाओं में ही तो जादू की छड़ी का असर दिखलाई देता है। पीएम चाहे ढूंढते रहें, पर हमने छिपा रखी है जब जरूरत होती है, छड़ी को तनिक घुमा देते हैं, पीएम को देने का भी कोई लाभ नहीं है, वो किसी भी फीमेल को थमा कर खुश हो लेंगे या खुश कर देंगे।

अब भला इतने सालों से लगे हुए थे। गरीबी मिटाने में देखा, एक बार में कमाल कर दिया। अब कौन हमारी काबलियत पर विश्‍वास नहीं करेगा। केवल घपले घोटालों में ही दिमाग नहीं खपाते हैं। कुछ दिमाग तो पब्लिक के लिए भी योजनाएं और आंकड़े बनाने में खपाते हैं।

बताओ क्‍या अब भी अन्‍ना के चक्‍कर में उलझे रहोगे या उस सम्‍मोहन से बाहर आकर फिर से हमें वोट दोगे। बाद में रिक्‍वेस्‍ट करोगे तो फिर से गरीब बढ़ा देंगे। आप हमें जिताकर खुश हो, हम आपको अमीरी की लाईन में जबर्दस्‍ती घुसाकर खुश कर देंगे। यह तो सरकार की उदारता है कि वो लिख दे रही है कि बत्‍तीस रुपये महीने से कम कमाने वाला गरीब है। नहीं लिखकर देगी तो भी सरकार का गला तो आप घोंट नहीं सकते क्‍योंकि सरकार आपकी बनाई हुई है और अपनों के तो सौ खून भी माफ होते हैं।

अमेरिका से हम क्‍यों तुलना कर रहे हैं। भारतीय संस्‍कृति में तो सदा से यह यह पाठ पढ़ाया जाता है कि अपने से गरीब को देखोगे और मस्‍त बने रहो। फिर आपकी खुशी के कोई आड़े नहीं आ सकता। अपने से अधिक सुविधा संपन्‍न से तुलना करके जलते कुढ़ते रहना कहां की लायकी है। पहले आंकड़े तो घटा लें जब आंकड़े घटाने से ही उद्देश्‍य पूरे हो रहे हैं तो गरीबों की वास्‍तविक संख्‍या कम करने की जद्दोजहद क्‍यों की जाए ?

क्‍या मालूम यह गरीबी कम करने और महंगाई घटाने का हमारी योजना का पहला चरण हो। आप हमें दूसरा कदम उठाने तो दीजिए। पर नहीं, आप में धैर्य तो है ही नहीं, बस सुनते ही बवंडर खड़ा करना आपकी आदत है। सरकार के मंसूबे थे और वो जनहित में अनाज, सब्जियों, फलों, दवाईयों, मकानों को फ्री में बंटवाने की योजना में मशगूल थी, पर आपको चैन कहां, डिस्‍टर्ब करके अपना ही नुकसान कर लिया आपने। उल्‍टे सरकार की नीयत पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लगा दिया। आप सरकार को कुछ करने देते नहीं हैं। हां, ऊधम मचाने में सबसे आगे रहते हैं। भला क्‍या ऐसी शरारतों से देश दौड़ता है, इसलिए जब दोबारा से पैट्रोल के रेट बढ़ाएं तो चुप बने रहना।

एक अस्‍वस्‍थ सरकार को हम देश तो सौंप सकते हैं परंतु वो कोई कारनामा करना चाहती तो हम तले से ही उखड़ जाते हैं। गरीबों को खत्‍म करने से गरीबी तो आटोमैटिक ही खत्‍म हो जाती है। वैसे भी हमारा घर गरीबखाना होता है और सामने वाला सदा दौलतमंद। लेकिन हम तो उल्‍टी गंगा बहाने में विश्‍वास रखते हैं इसलिए कहते हैं कि आपका घर गरीबखाना है और हम दौलतमंद। अब तो कोई एतराज नहीं है न आपको ?

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
October 2, 2011

अविनाश जी ,आपके द्वारा प्रस्तुत व्यंग की जितनी तारीफ की जाय कम है .हमारे नेता चाहते हैं सबको आमिर बता कर वह वाही लूट लें .गरीबों इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है?

abodhbaalak के द्वारा
September 29, 2011

क्या बात है अविनाश जी………..
सुन्दर सदा की भांति
http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Tamanna के द्वारा
September 27, 2011

अविनाश जी, कौन कहता है कि हमारे देश में गरीबी हैं. सरकारी आंकड़ों के हिसाब से तो हम बिल गेट्स को भी मात दे सकते हैं.  बहुत बढ़िया व्यंग्य…..

http://tamanna.jagranjunction.com/2011/09/22/gujrat-riots-2002-and-sabarmati-express-set-on-fire/

sumandubey के द्वारा
September 27, 2011

अविनाश जी नमस्कार्। सुन्दर सार्गभित व समसायिक व्यव्स्था पर बढिया व्यंग्य है। जब वोट देना होता है तो हम भारतवासी कौम जाति धर्म देख कर वोटं डालते है। और फिर नेताओ को कोसते है ।




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