अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

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वोटर का कैरेक्‍टर सबसे ढीला है : अब तो वे प्रसन्‍न हैं

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वे इज्‍जतदार हैं और जो कहते हैं डंके की चोट पर कहते हैं और उनके कहने पर कोई अधिकार हनन का आरोप भी नहीं लगा सकता है। कह रहे हैं कि जब देश का कानून लचीला है तो कैरेक्‍टर भी इतना लचीला तो होगा ही कि उसे लीची की तरह जब छीलेंगे तो उससे रस निकलेगा और रस पाने-पीने के लिए सब उपक्रम किए जाते हैं। कहीं जीवन रस, कहीं हास्‍य रस और कहीं नोट रस। वोटरों के वोट हथियाने के लिए भी नोटरस को काम में लाया जाता है क्‍योंकि वोटर का कैरेक्‍टर लचीला नहीं बल्कि इतना ढीला है कि आप जब चाहे उसे शराब की बोतल में खरीद लो, दो पांच हजार नकद जेब में डलवा दो, कुछ कंबल अथवा टीवी, मोबाइल फोन के उपहार दिलवा दो और वोट … गारंटिड अपने खाते में। वोट हमें सदा इतने सस्‍ते में मिल जाता है। एक झटके में ही वोटर हलाल हो जाता है,तो दूसरी बार उसकी गली में जाने का सोचना हमारा गंवारपन ही कहा जाएगा और वो हम नहीं हैं।

यही हालत अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की है। उनके दिमाग और रेट कितने ही चढ़े हुए हों, लेकिन सदा बिकाऊ हैं। नोट दो और जहां चाहे,जिस मंच पर नचवा लो। हमारे ऊपर ऊंगली उठाने से पहले सोचना चाहिए कि बाकी ऊंगलियां तो उनके गिरहबान और चोली की तरफ इशारा कर रही हैं। वही हैं ये जो चिल्‍लाते हैं कि चोली के भीतर क्‍या है …. जो ना बिकें, उनको बंदूक, लाठी का डर दिखलाकर काबू कर लिया तो क्‍या पाप कर दिया। पाप तो समाज में स्‍वीकार्य हैं। न किए जाएं तो गंगा-जमुनी संस्‍कृति का क्‍या होगा, जो खुद मैली-कुचैली और रसायनभरी होकर पाप धोने का दंभ भरती हैं।

इसलिए वोटर और अभिनेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि वे कोई दूध या शहद के धुले नहीं हैं। दूध और शहद है ही इतना महंगा कि हम भी बिस्‍लेरी पानी में नहाना तो अफोर्ड कर सकते हैं पर दूध में स्‍नान – न पूछो भगवान। दूध की जरूरत होने पर बीस चालीस लीटर मिनरल वाटर में एकाध लीटर दूध मिलाकर नहा लेंगे। मिनरल वाटर में न नहाएं तो फिर क्‍या खाए अघाए नेता हुए। जल बोर्डों और निगमों का गंदला पानी पीकर और उसमें नहाने के लिए जनता तो मजबूर है। हमारी नीयत ठीक न सही परंतु तबीयत सदा हरी रहती है। यूं ही कोई नाम के लिए थोड़े ही सांसद बनते हैं, बनने से पहले वोटर की गोबर भरी गलियों में एडि़यां घिसते हैं। पैदल चलते हैं, गंदे नाक बह रहे बच्‍चों के मुखड़े को प्‍यारा बतला कर चूमते हैं।

विदेशी बैंकों में हमारे खातों के बारे में आप सुनते हैं, तो कोरी अफवाह थोड़े ही हैं पर किसमें है इतनी हिम्‍मत कि हमसे पंगा ले। जो ले भी लेता है तो उनके बीच सरे रात लाठियों का प्रसाद भी तो हम ही बंटवाते हैं। इसलिए हे वोटरों/अभिनेताओं आप सबके हित में है कि हम विशेषाधिकार प्राप्‍त गोलाकार भवन में बैठे अपने चुने हुए नुमाइंदों से कभी तकरार न करे, न ले पंगा, नहीं तो उन्‍हें घुमा दिया जाएगा नंगा। जहां कल्‍पनाओं के घोड़ों की लातें भी आपको लादकर वहां तक नहीं ले जा सकती हैं।

रोजाना पुलिस आतंकवादियों को एनकाउंटर में नेस्‍तनाबूद करती रहती है। वे वही तथाकथित आतंकवादी होते हैं जो हम पर अपना रौब गालिब करना चाहते हैं, अब इतनी शायरी तो हमें भी आती है, इसलिए चुप भली है। हम तो सदा से चुप ही रहे हैं। हमारे तो कर्म ही दिखलाई देते हैं। इस बार बातें सर से ऊपर बहने लगी थीं इसलिए हमें रेपिड एक्‍शन लेना पड़ गया।

इसको सबक ही मानें। इस तरह न तो आरोप उछालें और न खुद उछलें। वरना तो सेंसेक्‍स के माफिक उनकी दुर्गति हो जाएगी। यह तो शुक्र मनाओ,इतने पर बस कर दिया, अपनी पर आ जाते, तो जितने लोग सुनकर हंस रहे थे, तालियां बजा रहे थे, मुंह फाड़ रहे थे, सब पर सीधे कार्रवाई कर देते। फिर चाहे आप चिल्‍लाते ही क्‍यों न रहते कि आजादी की दूसरी लड़ाई में जलियांवाला बाग की तरह अन्‍नालीला भ्रष्‍टाचार कांड हो गया, हमारा तो कुछ नहीं बिगड़ने वाला, जान तो तुम्‍हारी ही चली जाती, तुम्‍हारा शरीर छोड़कर। इसलिए जान लो कि, जान है तो जहान है। इसलिए हे निरीह वोटदाताओं जान देकर महान बनने के चक्‍कर से बचो।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
September 7, 2011

ख़ालिस व्यंग्य अन्ना भाई। आपके लेखों के तो सदा मुरीद रहे हैं। आभार सहित,

abodhbaalak के द्वारा
September 7, 2011

तो क्या हुआ अविनाश जी? ढीला हो या … , पर वो प्रसन्न तो हैं न :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/


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