अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

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दिमाग की आग में जलकर सब राख

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खेलों में भारत रत्न पाने के असली दावेदार सुरेश कलमाड़ी हैं। किसी खेल विशेष में न सही, परंतु कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित करवाने में जितनी भ्रष्टता उन्होंने बरती है, उसे एक विश्व कीर्तिमान स्वीकारा गया है। निःसंदेह बिना दावा सबमिट किए असली भारतीय खेल रतन के दावेदार वे ही बनते हैं। अगर यह रत्न अगले पांच वर्षों तक लगातार उन्हें ही दिया जाता रहे, तो भी कम ही है। खेल में खेलकर तो कोई भी रत्न हथिया सकता है, लेकिन बिना खेले सिर्फ आयोजन से जुड़कर रत्न हथियाना, कोई गिल्ली डंडा खेलना नहीं है। खेलों की व्यवस्था के आयोजनपूर्व व्यवस्थाओं में ही खूब सारे घपले- घोटालों का जो कीर्तिमान भोलू कलमाड़ी ने बनाया है, उसका दूर दूर तक कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं दिखलाई देता है। सब इन्हीं का ही बूता है कि घपले भी छोटे छोटे नहीं, विशालकाय और मोटे मोटे। कई हजार और उसमें जुड़े हैं करोड़ भी। इन्हें भोलू क्यों कहा गया है, इस बारे में आपको आगे खुद ही मालूम चल जाएगा।
कलमाड़ी स्मृतिदोष की चपेट में आ गए हैं, इसका यह मतलब मत लगाएं कि उन्हें किसी ने चपेट मारी होगा जिससे वे सब भूल गए होंगे। असल में उनके दिमाग में आग लग गई है और दिमाग की आग को बुझाने के लिए अभी तक फायर ब्रिगेड रूपी किसी यंत्र की खोज नहीं हो पाई है। नारको टेस्ट तो एकमात्र छलावा है। जिस प्रकार महत्वपूर्ण दस्तावेज कार्यालयों की आग की भेंट चढ़ा दिए जाते हैं। इन्होंने अपने दिमाग की याददाश्त को आग की भेंट चढ़ा दिया है और इसी वजह से उनका भूलना उन्हें भोलू कहकर पुकारे जाने के लिए पर्याप्त है। कलमाड़ी की याददाश्त वापिस लाने के लिए जरूरत है डॉक्टरों, ओझाओं, तांत्रिकों, झोलाछाप डॉक्टरी ठगों और मुन्नाभाई स्टाइल के चिकित्सकों की क्योंकि एक ठग ही दूसरे ठग की यादों को सुरक्षित तौर पर लौटा कर वापिस ला सकता है। मुझे तो यह महसूस हो रहा है कि कलमाड़ी ने खुद ही छिपा दी होगी अपनी याददाश्त और शोर मचा दिया कि गुम हो गई है। अब उन्होंने घोषित कर दिया है कि उनके दिल में कुछ-कुछ हो रहा है। दरअसल उनका दिल भी उन्हीं की भाषा बोल रहा है। जहां फायदा मिल रहा है, वहां पर तो उनकी यादें ताजा हैं। घाटे का सौदा महसूस होने पर भूलने का अहसास कुलांचे भरने लगता है। मानो, उसमें झांसी की रानी के चेतक की आत्मा समाई हुई हो। नहीं तो वो भला इतने भोले थोड़े ही है, वे दिमाग के तेज काले घोड़े हैं, उन्होंने इसी कालेपन के पीछे सब कुछ छिपा रखा है। उनकी शिवशक्ति इसी भाले और भोलेपन के कारण बरकरार है।
वैसे भी अपनी याददाश्त को भोलू ने छुट्टा तो छोड़ा नहीं होगा जो वो रास्ता भूल भटक गई। उसके साथ जरूर किसी को भेजा जाना चाहिए था, तिहाड़ में वैसे भी बहुत सारी चीजें होती तो हैं, पर वे नजर नहीं आती हैं। इनमें मोबाइल फोन, सिम कार्ड, चाकू, ब्लेड इत्यादि जब-तब साधारण कैदियों के पास मिल जाते है, तब इनकी बुद्धि (याद) का गुम होना, हैरत में डालता है। जब कलमाड़ी को जेल में बंद किया गया था, तब उसकी याददाश्त को भी तो जेल में बंद किया गया होगा, फिर कहां पर लापरवाही हुई कि जो जरूरी चीज थी, वही गुम हो गई। कलमाड़ी खो गया होता तो इतना हल्ला नहीं मचता। सब ढूंढ तलाश कर चुप हो जाते। भारतीय जेलों में तो अक्सर कैदी बहुत आसानी से खो जाते हैं।
अब यह देखना चाहिए कि जिसकी लापरवाही है, उस पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए, उसे बर्खास्त कर देना चाहिए, जेल में डाल देना चाहिए या उसे कह देना चाहिए कि कलमाड़ी जी की याददाश्त को तिहाड़ में से तलाशना, अब तुम्हारी जिम्मेदारी है। चाहे कंप्यूटर में फाइंड लिखकर उसे तकनीक के सहारे तलाशो, पर उसकी यादों को ढूंढकर ले आओ। तुम्हें एक्स्ट्रा इंक्रीमेंट भी देंगे और ईनाम से भी नवाजेंगे। और इससे भी हल न निकले तो एक जांच आयोग का गठन भी किया जा सकता है। भोलू को कैद करने से पहले एक बड़ा सा महाभारत स्टाइल का याददाश्त का प्रदर्शन रिकार्ड करवा लेना चाहिए था और वो इस वक्त और जरूरत के मौसम में बहुत मुफीद रहता। अब सोचना यह है कि इस गाड़ी में कौन सा गियर डाला जाए, जिससे भोलू कलमाड़ी की याददाश्त रिवर्स आए ?



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
August 16, 2011

अविनाश जी इलाज तो है, कहते है न की लातो के भूत ………………. ज़रा इसका प्रयोग करके देखा जाये शायद याददाश्त …… :) बहुत दिनों के बाद कमेन्ट कर रहा हूँ आशा है की आप मुझे भूले नहीं होगे…. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/


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