अविनाश वाचस्‍पति

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खतरनाक होते हैं सोते हुए लोग

Posted On: 21 Jul, 2011 में

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बाबा रामदेव की अनशन वाली सभा पर रामलीला मैदान में रात को पुलिस ने खूब सारी लाठियां बरसाईं। पुलिस जब लाठियां बरसाती हैं तो बेदर्दी से बरसाती है। बेरहमी से पब्लिक का खून बहाती है। खून बह रहा होता है और पुलिस की लाठियां चार्ज हो रही होती हैं। ऐसा सब कहते हैं जबकि लाठियां कोई मोबाइल फोन नहीं हैं जिनमें बैटरी लगी हुई होती हो और उन्‍हें चार्ज करना जरूरी हो। इसलिए पहले सिरे से ही इस आरोप को हम पुलिसवाले नकारते हैं कि लाठियों को किसी प्रकार भी चार्ज किया गया था। जबकि लाठियों से पिटाई करने से पहले लाठियों को तेल पिलाया जाता रहा है। हमने तो उन्‍हें तेल की छोडि़ए, दूध पानी तक भी नहीं पिलाया था। जिन लाठियों ने कुछ पिया ही नहीं , वे भला कैसे चार्ज हो सकती थीं। वैसे अगर आप बाबा रामदेव की अनशन सभा को तितर-बितर करने के लिए लाठियां मारने को चार्ज करना कह रहे हैं फिर तो मोबाइल फोन को भी मार मार कर चार्ज किया जा सकता होगा और ऐसा करने का क्‍या हश्र हो सकता है, आप एक बार मोबाइल को कहीं पर मार कर खुद ही चार्ज करके देख लीजिए। जब मोबाइल फोन ही चार्ज नहीं हो रहे हैं मारने से तो भला लाठियां कैसे चार्ज हो सकती हैं। उसी प्रकार जिस प्रकार पत्‍थर मारे जाने पर पत्‍थर चार्ज करना नहीं कहा जाता है। जिन चीजों को चार्जिंग की जरूरत पड़ती है, उसके बारे में तो सारी दुनिया जानती है। दिमाग जरूर चार्ज करना पड़ता है। उसको भी अगर दीवार में या पत्‍थर पर दे मारें तो जो चार्जिंग बची हुई होगी वो भी डिस्‍चार्ज हो जाएगी। अगर दिमाग चार्ज नहीं किया जाता होता तो ऐसे नायाब तरीके भला पुलिस को कैसे सूझ सकते थे। जिसके कारिंदों के दिमाग अपने ठेठ गंवारपने के लिए मशहूर हैं।जहां तक फोटो और वीडियो की बात है वो तो आजकल तकनीक इतनी सक्षम है कि जो नहीं हुआ उसे ऐसे और इतने सारे सबूतों के साथ पेश कर दिया जाता है कि ऑरीजनैलिटी भी शर्मा जाए। यही रामलीला की लीला देखने दिखाने के लिए किया जाता है।  वैसे तो समाज में लीला करने के लिए सब लालायित रहते हैं। कितनी प्रकार की लीलाएं हम आप बचपन से देखते सुनते रहते हैं। कभी कृष्‍ण लीला, कंस लीला, राम लीला, रास लीला, रावण लीला इनमें अगर पुलिस लीला और जुड़ गई तो क्‍या आफत आ गई। आखिर एक और लोक कला में इजाफा हुआ है। कलाओं की बेहतरी और वृद्धि के लिए तो हम सब लोग और समाज वैसे ही प्रयत्‍न करते रहते हैं। हमने इसमें थोड़ा सा संशोधन कर दिया तो क्‍या बुरा कर दिया। इतना हो हल्‍ला लीलाओं के लिए मचाने की क्‍या जरूरत है कि सब मचान बांधकर पुलिस के विरोध में तैनात हो गए हैं। जब आपके साथ कुछ होता है तब भी तो आप पुलिस की शरण मे ही आते हो, अगर हमने उस दिन खुदही आपको अपनी शरण में लेना चाहा और आप हमें देखकर ही डरकर त्राहि त्राहि करने लगे।जहां तक चैनलों की बात है तो वे तो सब कुछ सनसनीखेज बनाकर परोसने के लिए सदा तैयार रहते हैं। तो यह सब करामात अगर मीडिया ने कर ही दी तो क्‍या हुआ, आप इतने बेचैन क्‍यों हो रहे हैं।फिर लीला ही तो की है बाबा को लील तो नहीं लिया है हमने। जबकि बाबा खुद ही भ्रष्‍टाचार को लीलने के लिए नौ दिन से खाना पीना छोड़ रखे थे। कोशिश ही तो की थी पर लील तो एकाध को ही पाए हैं पर आप इस तरह चिल्‍लाए हैं कि मानो पुलिस ने लीला करके सारी कायनात ही लील ली हो।लाठीचार्ज की बात बेमानी है। वैसे भी बाबा भड़का रहे थे। यह कैसे साबित हो सकता है कि सोते हुए लोग भड़क नहीं सकते। सोते हुए लोग तो सबसे अधिक खतरनाक होते हैं। जो बोलते नहीं, उनसे सबको भय लगता है। सोते हुए लोगों पर बल प्रयोग करके पुलिस ने अपनी उद्यमशीलता का परिचय दिया है। कहा भी गया है कि एक चुप्‍पी का मुकाबला करना आसान नहीं है तो हमने सोते हुए चुप लोगों का मुकाबला करके कितना बड़ा तीर मारा है, इसे आप कैसे महसूस कर पायेंगे। वैसे भी पुलिस जोखिम वाले कार्य ही करती है, उसे मालूम था कि इस कार्रवाई पर उसे जरूर जवाबदेही का सामना करना पड़ेगा लेकिन हम तनिक चिंतित नहीं हए हैं और हमने पूरा जोखिम लिया है। हमें पुरस्‍कार देना तो दूर की बात, सीधी नजरों से भी नहीं देख रहे हैं आप आम लोग।

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

RAJ SINGH के द्वारा
August 5, 2011

सबसे बड़ी चिंता की बात तो यह है की सोने वाले बार बार जगाने पर , जगनॆ को तैयार नही है.

Amar Singh के द्वारा
August 4, 2011

शब्दों की लाठियों से बहुत सटीक प्रहार किये है, अविनाश जी आपने. आपके इस आलेख का शीर्षक अपने आप ही पूरी की पूरी कहानी कहने के लिए काफी है. वाकई सोते हुए लोग बड़े ही खतरनाक होते है किन्तु यहाँ यह भी बताना उचित होगा की आखिर किसके लिए खतरनाक होते है? खतरनाक होते है, स्वयं के लिए, समाज के लिए और आने वाली अगली पीरी के लिए और वर्त्तमान में सभी लोग खतरनाकपने की सीमाओं को तोड़ते हुए दिख रहे है. welcome for visit http://singh.jagranjunction.com/

nikhil jha के द्वारा
August 3, 2011

आदरणीय अविनाश जी, सधे हुए शब्दों में समसामयिक घटना-क्रम पर तीखा प्रहार मन को भा गया. सच कहा आपने, खतरनाक होते हैं सोते हुए लोग. ब्लोगर ऑफ़ दी वीक की हार्दिक शुभकामनाएं.

Dipanshu के द्वारा
August 3, 2011

baaap re baap loot poot kar diaaaa>>>>>>>>>>>>>. ha ha ha??????

munish के द्वारा
July 31, 2011

अविनाश जी, ऐसे लोगों को बीच चौराहे पर फांसी लगा देनी चाहिए जो पुलिस के विरुद्ध बात करते हैं…. बेचारी पुलिस जो आज के इस वातावरण मैं जैसे तैसे अपने को पुलिस के रूप में सिद्ध कर पा रही है उस पर ऐसे आरोप गलत हैं मैं आपके साथ हूँ चिंता न कीजिये मैं आम लोग में से नहीं हूँ

    अविनाश वाचस्‍पति के द्वारा
    August 2, 2011

    जी मुनीश जी, हर जोर जुलुम में हम सब साथ सात हैं।

rajuahuja के द्वारा
July 31, 2011

सच है ,दोष पुलिस का नहीं है ! वो तो मात्र आदेशों का पालन कर रही थी !पुलिस सर्विस ज्वाइन करते समय अपने अधिकारी के आदेश का अक्षरक्ष पालन करने की शपथ लेनी होती है !फिर ये सब भी वही कर रहे थे ! करते है ! करते रहेंगे पुलिस का स्लोगन है ” देशभक्ति-जनसेवा “आदेशों का पालन याने कर्त्तव्य के प्रति चेतना !हो गई देश भक्ति !रहा सवाल जनसेवा का तो डंडा मार भगाना भी जनसेवा ही है सिर्फ कर्म को नजरिया बदल कर देखने वाली बात है !अरे भाई ,फुटपाथ पर /मैदान में /ज़मीन पर /सोने से अच्छा है , घर जाकर आराम से पलंग पर सोओं !इस वास्ते लाठी मार कर भगाया गया था !इतनी सी बात और इतना सारा बवाल ! सच तो यह है ,हम जुर्म का सामना करने की बजाय उसे व्यंग में परोसते है,अच्छा लगता है ! हास्य-व्यंग भला किसे अच्छा नहीं लगेगा ? पीड़ा को व्यंग में परोसना भी कला है ! लोग चटकारे लेकर पढते हैं !बात आई -गई हो जाती है ,…बीती ताहि बिसार दे ! किसी शायर ने सच कहा है … मैं ही नहीं ,तू ही नहीं सारा ज़माना /दर्द का है एक फ़साना ! आदमी हो जाए दीवाना ,याद रहे गर ,भूल न जाये !! सुन्दर लेख के लिए साधुवाद !

    अविनाश वाचस्‍पति के द्वारा
    July 31, 2011

    राजू भाई भावों से आप भी भरे हुए हैं। अच्‍छा लगता है। जो बस में है हमारे, हम तो उसे ही चला पाते हैं। आपको लेख स्‍वादिष्‍ट लगा, आभारी हूं।

atharvavedamanoj के द्वारा
July 31, 2011

भैया अविनाश जी| पहले तो ब्लोगर ऑफ द वीक चुने जाने की हार्दिक बधाई ..इसके उपरांत सबकुछ कुशल मंगल है..आशा है आप भी कुशल होंगे|गांधी की लाठी को चार्ज कर दिल्ली के रामलीला मैदान में आप पुलिस वालों जो ने कारनामा कर दिखाया है …उसे शान्ति का नोबल पुरूस्कार मिलना तय था …लेकिन एक खता हो गयी …अपने इस महान कार्यक्रम को अंजाम देने से पूर्व डओसिस से भी संपर्क कर लेते तो आगे का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता|सस्नेह एक मरियल हिन्दुस्तानी|जय भारत, जय भारती|

    अविनाश वाचस्‍पति के द्वारा
    July 31, 2011

    मनोज भाई हिन्‍दी दिखता मरियल है पर उसमें बहुत दम है। वे पुलिस वाले भी तो हिन्‍दुस्‍तानी ही हैं और नेता। सब इनके ही दम पर है। अपनी ही अवाम के साथ छल, इसे ही बना रखा है इन्‍होंने बल। खैर … आपकी बधाई के लिए दिल से शुक्रिया।

shaktisingh के द्वारा
July 30, 2011

अविनाश जी,  सादर प्रणाम के साथ आपको बधाई दे रहा हु, बहुत ही अच्छा लगा की आप ब्लॉगर ऑफ द वीक चुने गए है.

    अविनाश वाचस्‍पति के द्वारा
    July 31, 2011

    सब आप लोगों का मेरे लिखे भावों और शब्‍दों के प्रति स्‍नेह है, जिससे अभिभूत हूं मैं।

surendr shukla bhramar5 के द्वारा
July 29, 2011

अविनाश वाचस्पति जी ब्लागर आफ दी वीक बनने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें सुन्दर , सार्थक व् व्यंग्य का पुट लिए हुए आलेख -सटीक लगा – कभी कृष्‍ण लीला, कंस लीला, राम लीला, रास लीला, रावण लीला इनमें अगर पुलिस लीला और जुड़ गई तो क्‍या आफत आ गई। आखिर एक और लोक कला में इजाफा हुआ है। शुक्ल भ्रमर ५

    avinashvachaspati के द्वारा
    July 30, 2011

    शुक्रिया भ्रमर जी। आभारी हूं। http://www.nukkadh.com पर भी सभी का स्‍वागत है।

Ramesh Nigam के द्वारा
July 29, 2011

aisi rachnaon se arm chair politician bhale hi charge ho jayen par main to ‘charge’ naheen ho pata. mujhe har samay 30 evam 40 ke dashak kee khoonrezi tathaa pakistan ke nirmaan ke sath manavta ko kalankit karne vaali ghatnayen aur kashmir gavaante hi nahin aoitu permanent nasoor banate nehru ke kal ki yaden jisme tibet ka anihileshan aur bharat ki sharmnak har bhi shamil hai, teestee rahtee hai. na aisa begairat desh na aisee nakara sarkar kaheen swabhimani rashtr men dekhne ko milegi aur na sunne ko, jo hina ke roop, lavany, 17 lakh ke baig, 13 lakh ki ghadee aur motiyon ki mala par mugdh hota raha par kshmiri algavvadiyon se uski bhent tathaa purane jakhmon ko bhoolne ki naseehat par pratikriya tak na de us rashtr ke logon ko lathiyan khate kide makodon ki zindgi hi nasib hogi

Tamanna के द्वारा
July 29, 2011

ब्लॉगर ऑफ द वीक बनने के लिए बहुत बहुत बधाई अविनाश जी. आपका लेख वकई सशक्त है.

    avinashvachaspati के द्वारा
    July 30, 2011

    धन्‍यवाद तमन्‍ना जी।

    avinashvachaspati के द्वारा
    July 30, 2011

    मुझे किंचित भी एतराज नहीं है। यह तो मेरी रचना का सौभाग्‍य है।

tejwani girdhar, ajmer के द्वारा
July 29, 2011

अच्छी रचना है, वाकई तारीफ के काबिल है

    avinashvachaspati के द्वारा
    July 30, 2011

    शुक्रिया गिरधर जी

bharodiya के द्वारा
July 21, 2011

अविनाशभाई किस बात का रोनाधोना । कोन्ग्रेसी बेटरी को, हर ५ साल बाद , हम की चार्ज करते है ना ? फीर ? हमने ही उसके हाथमे लाठि पकडाई है । वो लाठि को फुलो से तो नही सजायेन्गे । लाठि मे लोह-चुम्बक लगाये या खून-चुम्बक, हमे क्या ? हमे तो लाठी खाने से मतलब ।

    अविनाश वाचस्‍पति के द्वारा
    July 22, 2011

    लाठी खाने की जरूरत क्‍यों आ पड़ी, यह तो वही चार्ज वालीबात होगई  जी

nishamittal के द्वारा
July 21, 2011

आपने तो अपने लेख से सबके दिमाग की बैटरी को चार्ज कर दिया.बधाई.

    avinashvachaspati के द्वारा
    July 31, 2011

    दिमाग की बैटरी को इन सबके बिना भी चार्ज होती रहनी चाहिए निशा जी प्रकाश में किरण की तरह।

Santosh Kumar के द्वारा
July 21, 2011

आदरणीय अविनाश जी , सादर नमस्कार ,… बहुत अच्छी पोस्ट ,…बधाई ,…………..अब तो जागना ही होगा ……शुभकामनाएं

    avinashvachaspati के द्वारा
    July 31, 2011

    सृजनधर्मी को तो सोते हुए भी सदैव जागते रहना चाहिए संतोषभाई।

संतोष त्रिवेदी के द्वारा
July 21, 2011

जब सोते हुए लोग इत्ते खतरनाक होते हैं तो जग जायेंगे तो सोचिये का होगा ?

    अविनाश वाचस्‍पति के द्वारा
    July 21, 2011

    इसलिए दिल्‍ली पुलिस ने सोते हुओं पर हमला करके ही संतोष कर लिया।

    bharodiya के द्वारा
    July 21, 2011

    सन्तोषभाई —- जब सोते हुए लोग इत्ते खतरनाक होते हैं तो जग जायेंगे तो सोचिये का होगा ?——- भारतमा की गोद छोड भारतबाप के बेटे बन जायेगे । अधिक जानकारी के लिये मेरा पिछा किजिये ।


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