अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

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खुश है जमाना आज पहली तारीख है

Posted On: 1 Apr, 2010 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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haribhoomi1april2010

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kamalkishor Boob के द्वारा
February 28, 2013

एीगकीगेपोस ओलूोीसोल

R K KHURANA के द्वारा
April 1, 2010

आजकल खुश होने को क्या रह गया है ! इतनी मंहगाई में पहली तारिख आने से पहले ही खर्चे का हिसाब हो जाता है तथा वेतन से अधिक खर्चा जोने के कारण पहली तारिख भी अब खुश नहीं करती ! बस ढोल पीटे जा रहे हैं ! बाकि तो इश्वर ही मालिक है !

avinashvachaspati के द्वारा
April 1, 2010

मूर्ख दिवस कहीं जाता नहीं है वो तो यहीं बसा रहता है सबके दिमाग में। बस सिर्फ होता यह है कि एक अप्रैल को वह उकसाए जाने पर अपनी पूर्णता में सिर उठाता है और अपने वजूद का ऐलान कर देता है और देखिए सब उसके प्रभाव में बह जाते हैं या मोहग्रसित हो जाते हैं। अब सुबद्धि सुप्‍त ही पड़ी रहे तो उसेकी ओर किसी का ध्‍यान नहीं जाता है। पर मूर्खता सिर उठाती है तो सबको अपनी तरफ ताकता पाती है और अपनी तरफ ताकने या घूरने के अहसास से दिमाग खुदबखुद असमंजस की स्थिति में आकर ताबड़तोड़ मूर्खताएं कर बैठना है और जिनमें ये मूर्खताएं सिर उठाने लगती हैं वे पहले बरस भर से दिमाग में कुलबुला रही होती हैं। वैसे मूर्खता को जितना दबाया जाता है वो उससे भी अधिक तेजी से कुलांचे मारती है। एक रबर की ठोस गेंद की माफिक, अब आप दिमाग को रबर की ठोस गेंद भी मान सकते हैं, जिसे जितने वेग से दबाया जाता है वो उससे भी अधिक वेग से आपके दवाब से मुक्ति के लिए छटपटाती है और मौका पाते ही चौगुनी ताकत से ऊपर की ओर उछलती है। नतीजा, जिनको नहीं दिखलाई दे रही थी, उनको भी दिखलाई दे जाती है और यही मूर्खता का बाजारीकरण है जगह-जगह पर आप सेल में सामान बिकता देखकर इस अहसास में जकड़ते जाते हैं। मानो, आपको फ्री में मिल रहा है सामान और खूब सारा बेजरूरतीय सामान खरीद कर अपना घर भर लेते हैं। सर्दियों में गर्मियों के कपड़ों के ढेर और गर्मियों में सर्दियों के। सेल सदा बेमौसम ही लगाई जाती है क्‍योंकि सेल समान कुछ भी नहीं है। यह बाजार का चालाकीकरण है। इसी का और अधिक चालाकीकरण करते हुए आजकल दुकानों में एक के साथ चार या दो के साथ दस जींस, शर्ट इत्‍यादि फ्री में दी जाती हैं विद 80 प्रतिशत छूट के साथ, जबकि यह सरेआम लूट ही होती है। पता नहीं हम सब यह क्‍यों मान लेते हैं कि कोई भी विक्रेता, निर्माता या दुकानदार फ्री में हमें बेचेगा। इसे बाजारू कलात्‍मकता कहा जा सकता है। जिसमें हम अपने को महाबुद्धिमान समझ कर अपनी मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे होते हैं अपनी जेब से नोट लुटा लुटाकर। इसी प्रकार आजकल मोबाइल फोन के आने से मूर्खता की संभावनाओं में घनघोर इजाफा हुआ है और मोबाइल की तरह मूर्खों की भरमार हो गई है। रोजाना नई स्‍कीमें लांच की जा रही हैं जो कि नि:संदेह मूर्ख बनाने की फैक्‍टरियां हैं – तीस रुपये खर्च करके दो हजार एसएमएस एक महीने में फ्री। यह मूर्खता एक रुपये रोजाना की दर से बेची जा रही है। इसी प्रकार कई मूर्खताएं दस रुपये रोजाना अथवा 200 रुपये महीने में भी धड़ल्‍ले से बिक रही हैं जिनमें आपको एक खास अपने नेटवर्क पर अनलिमिटेड टॉक टाइम दिया जाता है और आप अपने जीवन के कीमती पलों को फिजूल की बातें कर करके गर्क कर लेते हैं और अपनी बुद्धिमानीय कला पर मोहित होते हैं। अब भला एक या दस रुपये रोज खर्च करके सुविधाएं फ्री मिलना – क्‍या वास्‍तव में रुपये लेकर मूर्ख नहीं बनाया जा रहा है तो यह व्‍यापार खूब फल रहा है और फूल रहा है और फूल बन रहे हैं हम सब।

    मनोज के द्वारा
    April 1, 2010

    महोदय मुझे लगता है आपने पोस्ट की जगह कमेंट डाल दिया है, फिर ही 1 अप्रैल के ऊपर आपका कमेंट काफी सराहनीय हैं. लेकिन कोशिश करें की फोटो डालने की बजाय कुछ ब्लॉग पर लिखें.


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