अविनाश वाचस्‍पति

विचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

107 Posts

253 comments

अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

सचिन, रियली यू आर जीनियस

Posted On: 17 Nov, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Hindi Sahitya Junction Forum Technology में

1 Comment

हरिबोल हथकड़ी खोल – आसाराम

Posted On: 2 Oct, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Junction Forum Others Religious Special Days में

2 Comments

Page 1 of 2212345»1020...Last »

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ॊTechnologyTechnology नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी जे आरोप लगाया कि मोदी,जाति के नाम पर ओछी राजनीति कर रहे है./जब की आम जनता जानती है कि priyanka गांधी ने नींच राजनीती काहा है अखबर मे भीं स्पष्ट नींच राजनीती नहीं / बंगारू लक्ष्मण की अखबारों मे खबर क़्या अच्छी राजनीती का प्रमाण था/ राहुल गांधी ने अमेठी में कहा कि नीच कर्म होते हैं, नीच जाति नहीं. ईसी प्रकार 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला, आदर्श घोटाला, सांसद घूस कांड जैसे कृत्य राजनीति की किस श्रेणी में आता है? नेतृत्व जो भी करे उन्हे यह सोचना होगा की वह देश कि करोडो जनता के साथ न्याय अर्थव्यस्था,मजबूत करने के लिए त्याग करे, देश को समर्थ बनाए/ जाती का बटवारा, हमारे सविधान निर्माताओं ने हमें अच्छा संविधान दिया है, हमें आरक्षण के चक्कर में डाल कर बाँट दिया (ये प्रावधान मात्र 10-15 वर्षों के लिए ही था), किसी को सवर्ण तो किसी को अनुसूचित और किसी को पिछड़ा बना दिया| उन्होने ये संविधान भारत की जनता के लिए नही बनाया बल्कि अँग्रेज़ों की नीतियों को ध्यान में रख कर राजनेताओं की खातिरब नाया लगता है| पाठक बताये जाति,राजनीती,सँविधान 

के द्वारा:

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा:

के द्वारा: अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई

प्रिय ब्लॉगर मित्र, हमें आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है साथ ही संकोच भी – विशेषकर उन ब्लॉगर्स को यह बताने में जिनके ब्लॉग इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें किसी भी सूची में सम्मिलित करने से उस सूची का सम्मान बढ़ता है न कि उस ब्लॉग का – कि ITB की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगों की डाइरैक्टरी अब प्रकाशित हो चुकी है और आपका ब्लॉग उसमें सम्मिलित है। शुभकामनाओं सहित, ITB टीम पुनश्च: 1. हम कुछेक लोकप्रिय ब्लॉग्स को डाइरैक्टरी में शामिल नहीं कर पाए क्योंकि उनके कंटैंट तथा/या डिज़ाइन फूहड़ / निम्न-स्तरीय / खिजाने वाले हैं। दो-एक ब्लॉगर्स ने अपने एक ब्लॉग की सामग्री दूसरे ब्लॉग्स में डुप्लिकेट करने में डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर रखी है। कुछ ब्लॉगर्स अपने मुँह मिया मिट्ठू बनते रहते हैं, लेकिन इस संकलन में हमने उनके ब्लॉग्स ले रखे हैं बशर्ते उनमें स्तरीय कंटैंट हो। डाइरैक्टरी में शामिल किए / नहीं किए गए ब्लॉग्स के बारे में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा। 2. ITB के लोग ब्लॉग्स पर बहुत कम कमेंट कर पाते हैं और कमेंट तभी करते हैं जब विषय-वस्तु के प्रसंग में कुछ कहना होता है। यह कमेंट हमने यहाँ इसलिए किया क्योंकि हमें आपका ईमेल ब्लॉग में नहीं मिला। [यह भी हो सकता है कि हम ठीक से ईमेल ढूंढ नहीं पाए।] बिना प्रसंग के इस कमेंट के लिए क्षमा कीजिएगा।

के द्वारा:

छपास रोग इतना विकट होता है कि लेखक मुगालते में जीता है कि जैसा उसने लिखा है, वैसा कोई सोच भी नहीं सकता, लिखना तो दूर की बात है। बहुत सारे अखबार, पत्रिकाएं, लेखक को क्‍या मालूम चलेगा, की तर्ज पर ब्‍लॉगों और अखबारों में से उनकी छपी हुई रचनाएं फिर से छाप लेती हैं। इसका लेखक को मालूम चल भी जाता है किंतु वह असहाय-सा न तो अखबार –मैगज़ीन वाले से लड़ पाता हे और न ही अपनी बात पर अड़ पाता है। लेखक कुछ कहेगा तो संपादक पान की लाल पीक से रंगे हुए दांत निपोर कर कहेगा कि ‘आपका नाम तो छाप दिया है रचना के साथ, अब क्‍या आपका नाम करेंसी नोटों पर भी छापूं ।‘ उस पर लेखक यह कहकर कि ‘मेरा आशय यह नहीं है, मैं पैसे के लिए नहीं लिखता हूं।‘ ‘जब नाम के लिए लिखते हैं तब आपका नाम छाप तो दिया है रचना के साथ।‘ फिर क्‍यों आपे से बाहर हुए जा रहे हैं और सचमुच संपादक की बात सुनकर लेखक फिर आपे के भीतर मुंह छिपाकर लिखना शुरू कर देता है। श्री वाचस्पति जी , नमस्कार ! बड़ी बात कही आपने !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

भारत दुर्दशा को जिन भारतेन्दु जी ने कृतिबद्ध किया शायद वह अब हिंदी दुर्दशा को देख समझ गए होते उसका मूल कहाँ है ? हिंदी के किसी भी आयाम को ,किसी भी विधा को इस उपेक्षा से दो -चार होना ही पड़ा ,और कारण , ?अपनी भाषा को दोयम दर्जे का को समझने का फैशन | शादियों का निमंत्रण भी अंग्रेजी में छापे जा रहे हैं ,जबकि उन्हें किसी अंग्रेज को आमंत्रित भी नहीं करना ,बात सिर्फ स्टेटस -सिम्बोल की है | एक और बात -पुस्तक मेलों में हो या कहीं और भी प्रकाशकों और आयोजकों को भीड़ जुटाने से मतलब है -"सुना है बाज़ार खुल चुका है |"तो भीड़ जुटेगी फ़िल्मी सितारों से | गनीमत है बार बालाओं को अभी प्रवेश के लिए इंतज़ार करना पड रहा हैं ,वर्ना पुस्तक मेलों में स्थान के लिए आरक्षण करवाना पड़ता | वैसे भी हिंदी स्टालों से अधिक चाट -पकौडों की दुकान पर अधिक हलचल होती है |एकु -प्रेशर की कीलें बेचने वाले भी व्यस्त होते हैं ,२ रूपये में जादू सिखाने वाले भी ,और हिंदी प्रकाशकों की हालत आपसे छुपी नहीं | पर ,समस्या तो यह है की हैरी -पॉटर के प्रकाशकों को व्यवस्था बनाने के लिए गार्डों का सहारा लेना पड़ता है ,क्योकिं वह पुस्तक शो -केस में अधिक जँचता है और ड्राइंग -रूम में भी,जबकि उस कामिक्स का मूल्य हिंदी के साहित्यकृतियों से कई गुना अधिक रखा गया है ,और शान से उस मूल्य को अपने क्रेडिट कार्ड से चुकाते हैं | और अखबार वाले करें भी तो क्या ,सैफ और सलमान को पेज थ्री में डालकर उन्हें सुनिश्चित करना होता है की मेधावी विद्यार्थी रगीन पृष्ठों को पुस्तकों की जिल्द के लिए सदुपयोग करें | अंग्रेजी अखबार तो आपको मेज पर सुबह इसलिए चाहिए की जिससे कोई अतिथि आ जाएँ तो आपको शर्मिंदगी ना उठानी पड़े | हरेक अखबार का अपना एजेंडा है ,संपादकीय उन एजेंडों के लिए आरक्षित है ,हाँ अगर आपने अपनी रचना को विवादित बना दिया होता तो हो सकता था ऐसी नौबत ना आती !

के द्वारा: डा . आलोक रंजन डा . आलोक रंजन

के द्वारा: अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई

"कि मूर्तियों के धड़ इस्‍तेमाल में ले लें और उस पर अपनी पसंद की मुंडी फिट करवाये, तरीका यह सुपर-डुपर हिट रहेगा। बहुत कम खर्च में गिन्‍नीज बुक में शामिल होने की डील। वैसे मूर्तियों को मुखौटे पहनाकर भी इस लक्ष्‍य को हासिल किया जा सकता है पर इस तरीके में वो बात नहीं, जो मुंडी बदलने में है।"..........अति सुन्दर लेख के लिए धन्यवाद्. आप के इन शब्दों से याद आया की जो बात किरण बेदी जी ने राम लीला मैदान से कही थी वह कितनी सटीक थी की हमरे ये (अ)राजनेता चाहे किसी भी दल से हों अगर सब के सब नहीं तो १०० में से ९५ से ९८% तक मुखोटे ही तो हैं............वर्ना क्या बात है की देश आम जनता आज़ादी के ६४ saal बाद भी रोटी कपड़ा और माकन से बेहाल है और हमारे ये नेता आज कंगाल तो कल कुर्सी मिलते ही मालामाल हैं.......... कोई चिराग तो जलाओ बहुत अँधेरा है...........

के द्वारा:

के द्वारा: pramod chaubey pramod chaubey

के द्वारा:

राजस्थान :सेवानिवृत्त शिक्षक ने खोला स्कूल, यहां नहीं लगती फीस सेवानिवृत्त शिक्षक सांवरमल शर्मा को देखकर आरक्षण फिल्म का वो सीन सामने आ जाता है, जब अमिताभ बच्चन गरीब तबके के बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के लिए तबेले में कोचिंग क्लास लगाते हैं। ऐसा ही कुछ सांवरमल कर रहे हैं। 1997 से वे एक ऐसा स्कूल चला रहे हैं, जिसमें न तो फीस लगती है और न ड्रेस व किताबों का खर्चा। खास बात यह है कि वे खुद घर-घर जाकर ऐसे बच्चों को तलाशते हैं, जो पैसे के अभाव में पढ़ नहीं पाते या फिर उनके परिवार में कभी कोई पढ़ा- लिखा नहीं। सेवाकाल के दरमियान ही अपने सहकर्मियों के साथ चर्चा करते हुए सांवरमल शर्मा ने प्रस्ताव रखा था कि स्कूल में पैसा लेकर खूब पढ़ा लिया अब सेवानिवृत्ति के बाद बिना पैसे लिए ऐसे बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं जो स्कूल नहीं जा सके। सभी ने प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी। इसके बाद 24 जून 1997 को बाल सेवा सदन के रूप में यह अनोखा स्कूल शुरू हुआ और इसमें पहला प्रवेश हुआ। खास बात देखिए कि पहला एडमिशन भी स्कूल में ऐसे सात वर्षीय बच्चे का हुआ, जिसके माता- पिता का बचपन में ही साया उठ चुका था। साथी शिक्षकों के सहयोग और अथक मेहनत से वह बच्चा दसवीं तक पढ़ाई कर स्वावलंबी बना। बकौल सांवरमल, वर्तमान में विद्यालय में 63 बच्चें हैं, जिनको पुस्तकों के अलावा ड्रेस तथा स्वेटर भी दिया जा रहा है। बेशकीमती जमीन स्कूल के नाम मोदी संस्थान के ठीक सामने बेशकीमती जमीन होने पर कोई भी शख्स प्रोजेक्ट शुरू कर करोड़ों कमाने की प्लानिंग करेगा। लेकिन, सेवानिवृत्त शिक्षक सांवरमल ने मोदी संस्थान के सामने अपनी जमीन में से दो बीघा इस अनोखे स्कूल बाल सेवा सदन को देकर रजिस्ट्री करवा दी। 15 साल पहले एक खेजड़ी के नीचे शुरू हुए इस अनोखे स्कूल में सांवरमल शर्मा तथा उनके साथी शिक्षकों व कुछ पहचान वालों के सहयोग से तीन चार कमरे तथा पानी की व्यवस्था भी हो गई है। स्कूल में स्वयं सांवरमल के अलावा उनकी बेटी तथा एक अन्य वैतनिक शिक्षक पढ़ा रहा है। स्कूल में पढ़ने वाले कुछ बच्चों के खाने की व्यवस्था भी सांवरमल अपने घर से कर रहे हैं

के द्वारा:

के द्वारा: chandrajeet chandrajeet

मैंने तो सुना है कि राहुल बाबा (राल विंसी) की भी डिग्री फर्जी है कुछ दिन पहले नेट पर बाकायदा उनकी फर्जी डिग्री भी देखी है| हिन्दुस्तान में आने के बाद एंटोनिया माइनो ने भी नकली राशन कार्ड के दम पर ही मतदान किया था और बदस्तूर आज तक कर रही हैं बल्कि सांसद भी हैं| इस खानदान का नाम तक नकली है| सबको पता है कि ये नेहरु (अगर ये खानदानी नाम है तो) भी नकली हैं और गांधी भी क्योंकि ये सभी नकली गांधी तो फिरोज के वंशज होने चाहिए| सब गडबड घोटाला है कुछ समझ नहीं आता अगर बालकृष्ण के कृत्य को अपराध कहेंगे तो क्या नेहरु के वंशज भजन गा रहे हैं ? मुझे तो लगता है सारे के सारे सर से पांव तक झूठ से ही बने हैं| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

कौन सी सरकार ?!!! ये , ये नकली सरकार ? सरकार नकली ईस लिये है की हमारे विधायक नकली है । वो ईस लिये नकली है के उसे हमने नही चुने पार्टी के गेन्ग लिडरोने खूद टिकिट दे के चुना है । जरुरी नही की पार्टी मे अच्छे नेता नही होते है, होते है । लेकिन उसे हमारे समने नही रख्खा जाता, बदमाश को ही टिकिट मिलता है । है हमारे पास अच्छे नेता चुनने की चोईस ? अगर एक सीट पर १०-२० नेता एक ही पार्टी के खडे हो जाय तब हम अच्छा नेता ढुन्ढ सकते है, वरना बदमाश को चुनने के अलावा हमारे पास कोइ चारा नही है । जीसे हमने नही चुना है ऐसे लोगो के नाम पर हमे थप्पा मारना पडता है । ऐसे थप्पे को ही लोकशाही समज कर ईतराना हो तो ईतरा सकते हो । मेरी नजर मे ये प्रजा का खुद का चुना हुआ विधायक नही है, आपको मजबूर किया गया है थप्पा मारने ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

सच है ,दोष पुलिस का नहीं है ! वो तो मात्र आदेशों का पालन कर रही थी !पुलिस सर्विस ज्वाइन करते समय अपने अधिकारी के आदेश का अक्षरक्ष पालन करने की शपथ लेनी होती है !फिर ये सब भी वही कर रहे थे ! करते है ! करते रहेंगे पुलिस का स्लोगन है " देशभक्ति-जनसेवा "आदेशों का पालन याने कर्त्तव्य के प्रति चेतना !हो गई देश भक्ति !रहा सवाल जनसेवा का तो डंडा मार भगाना भी जनसेवा ही है सिर्फ कर्म को नजरिया बदल कर देखने वाली बात है !अरे भाई ,फुटपाथ पर /मैदान में /ज़मीन पर /सोने से अच्छा है , घर जाकर आराम से पलंग पर सोओं !इस वास्ते लाठी मार कर भगाया गया था !इतनी सी बात और इतना सारा बवाल ! सच तो यह है ,हम जुर्म का सामना करने की बजाय उसे व्यंग में परोसते है,अच्छा लगता है ! हास्य-व्यंग भला किसे अच्छा नहीं लगेगा ? पीड़ा को व्यंग में परोसना भी कला है ! लोग चटकारे लेकर पढते हैं !बात आई -गई हो जाती है ,...बीती ताहि बिसार दे ! किसी शायर ने सच कहा है ... मैं ही नहीं ,तू ही नहीं सारा ज़माना /दर्द का है एक फ़साना ! आदमी हो जाए दीवाना ,याद रहे गर ,भूल न जाये !! सुन्दर लेख के लिए साधुवाद !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

के द्वारा: avinashvachaspati avinashvachaspati

मूर्ख दिवस कहीं जाता नहीं है वो तो यहीं बसा रहता है सबके दिमाग में। बस सिर्फ होता यह है कि एक अप्रैल को वह उकसाए जाने पर अपनी पूर्णता में सिर उठाता है और अपने वजूद का ऐलान कर देता है और देखिए सब उसके प्रभाव में बह जाते हैं या मोहग्रसित हो जाते हैं। अब सुबद्धि सुप्‍त ही पड़ी रहे तो उसेकी ओर किसी का ध्‍यान नहीं जाता है। पर मूर्खता सिर उठाती है तो सबको अपनी तरफ ताकता पाती है और अपनी तरफ ताकने या घूरने के अहसास से दिमाग खुदबखुद असमंजस की स्थिति में आकर ताबड़तोड़ मूर्खताएं कर बैठना है और जिनमें ये मूर्खताएं सिर उठाने लगती हैं वे पहले बरस भर से दिमाग में कुलबुला रही होती हैं। वैसे मूर्खता को जितना दबाया जाता है वो उससे भी अधिक तेजी से कुलांचे मारती है। एक रबर की ठोस गेंद की माफिक, अब आप दिमाग को रबर की ठोस गेंद भी मान सकते हैं, जिसे जितने वेग से दबाया जाता है वो उससे भी अधिक वेग से आपके दवाब से मुक्ति के लिए छटपटाती है और मौका पाते ही चौगुनी ताकत से ऊपर की ओर उछलती है। नतीजा, जिनको नहीं दिखलाई दे रही थी, उनको भी दिखलाई दे जाती है और यही मूर्खता का बाजारीकरण है जगह-जगह पर आप सेल में सामान बिकता देखकर इस अहसास में जकड़ते जाते हैं। मानो, आपको फ्री में मिल रहा है सामान और खूब सारा बेजरूरतीय सामान खरीद कर अपना घर भर लेते हैं। सर्दियों में गर्मियों के कपड़ों के ढेर और गर्मियों में सर्दियों के। सेल सदा बेमौसम ही लगाई जाती है क्‍योंकि सेल समान कुछ भी नहीं है। यह बाजार का चालाकीकरण है। इसी का और अधिक चालाकीकरण करते हुए आजकल दुकानों में एक के साथ चार या दो के साथ दस जींस, शर्ट इत्‍यादि फ्री में दी जाती हैं विद 80 प्रतिशत छूट के साथ, जबकि यह सरेआम लूट ही होती है। पता नहीं हम सब यह क्‍यों मान लेते हैं कि कोई भी विक्रेता, निर्माता या दुकानदार फ्री में हमें बेचेगा। इसे बाजारू कलात्‍मकता कहा जा सकता है। जिसमें हम अपने को महाबुद्धिमान समझ कर अपनी मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे होते हैं अपनी जेब से नोट लुटा लुटाकर। इसी प्रकार आजकल मोबाइल फोन के आने से मूर्खता की संभावनाओं में घनघोर इजाफा हुआ है और मोबाइल की तरह मूर्खों की भरमार हो गई है। रोजाना नई स्‍कीमें लांच की जा रही हैं जो कि नि:संदेह मूर्ख बनाने की फैक्‍टरियां हैं – तीस रुपये खर्च करके दो हजार एसएमएस एक महीने में फ्री। यह मूर्खता एक रुपये रोजाना की दर से बेची जा रही है। इसी प्रकार कई मूर्खताएं दस रुपये रोजाना अथवा 200 रुपये महीने में भी धड़ल्‍ले से बिक रही हैं जिनमें आपको एक खास अपने नेटवर्क पर अनलिमिटेड टॉक टाइम दिया जाता है और आप अपने जीवन के कीमती पलों को फिजूल की बातें कर करके गर्क कर लेते हैं और अपनी बुद्धिमानीय कला पर मोहित होते हैं। अब भला एक या दस रुपये रोज खर्च करके सुविधाएं फ्री मिलना – क्‍या वास्‍तव में रुपये लेकर मूर्ख नहीं बनाया जा रहा है तो यह व्‍यापार खूब फल रहा है और फूल रहा है और फूल बन रहे हैं हम सब।

के द्वारा: avinashvachaspati avinashvachaspati

के द्वारा:

के द्वारा:




latest from jagran